जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
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ग़ज़ल बे-बहर (नज़्म ही मेरी आवाज़ है )
ग़ज़ल बे-बहर {नज़्म ही मेरी आवाज़ है} ================ अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय 09871603621 1. एक-एक कर ढ़हने लगीं ईमारतें ........................................... एक-एक कर ढ़हने लगी ईमारतें बनी हैं रेत में दिखती हैं अब आदमी कहाँ भीड़ उजड़ी इन बस्तियों में दिखती है। उम्र भर कोशिश करते रहे धरोहरों को बचाए रखने की पर उजड़े गांवों की टीस यहाँ कहां किसी में दिखती है। लबालब पोखर में पेड़ की फुनगी चढ़ कूदने की कशिश बंद-साँसों गोता लगा तलहटी छूने वालों में दिखती है। पता है जम्हुरियत की फसल अब ईंवीएम में लहराने लगी धूर्त्तों को मिली चैन उनकी बेफ़िक्री की नींद में दिखती है। ज़िन्दगी की जंग जीतने का ज़ज्बा बीती कहानी भर नहीं अपनों की मुस्कुराहट अब आभासी दुनिया में दिखती है। कैसे मर जाने दूँ जज़्बात ज़िन्दा रहने का हौसला 'अमर' पांडवों की साधना की परिणति महाभारत में दिखती है। 2. भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं ..................................................... वो हिन्दू-मुसलमां मंदिर-मसजिद की सियासत किया करते हैं धरम के नाम पर भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं । ये घि...
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...
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