रात देर से आया.पहली बार दिल्ली से आगरा और उससे भी आगे सेवाल अहीर गाँव गया ख़ुद गाड़ी चलते हुए .सज्जन और दिल से मदद करने वाले लोग आज भी बहुत हैं.लेकिन राजनीति के खिलाड़ियों नि अपनी चाल होती है.परन्तु मैं संतुष्ट हूँ की मैं अपना काम कर रहा हूँ.पूनम भी मेरा पूरा साथ दे रही है.मेरे साथ गयी-आयी.थक कर सोई है.साक्षी स्कूल गई तो मैं उठकर ब्लॉग खोलकर बैठ गया.सूरज जी स्वस्थ रहते तो इस बार चुनाव जरूर लड़ते.इश्वर शीघ्र उन्हें स्वस्थ बनायें.केंसर जैसी बीमारी पर काबू पाना ईश्वर की कृपा और ख़ुद की जीजीविषा से ही संभव है.अचानक दो महीने में कितना बदल गया सूरज जी का संसार.४ मार्च को सफल ऑपरेशन हो गया.१६ मार्च को घर भी आ गए हैं.अभी ठीक ही हैं.नोर्मल होने में अभी वक्त लगेगा.ईश्वर कृपा करें.केंसर के नाम से दिल दहल जाता है.समीर बाबू कहाँ टिक पाए.गायत्री को इस छोटी सी उम्र में कितना बड़ा दुःख झेलना पड़ रहा है.परन्तु इंसान को तो परिस्थितियों से जूझना ही पड़ता है.प्रत्येक विषम परिस्तिथि में भी सतुलन बनाये रखने वाला ही विजयी होता है.पूज्य बाबूका ने उद्रार में कितना सही लिखा है---रूकने वाला हर चुका है,मंजिल पर ही क्यों न रुके/अविरल चलने vala
जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
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