माना की हम इतिहास के सर्वाधिक खौफनाक दौर के गवाह बन रहे हैं, लेकिन वाबजूद इनके हमारे आस-पास बहुत कुछ ऐसा घटित होता रहता हैं जिनमें जिंदगी करवटें बदलती हैं। जीवन-शून्य नहीं हो गए हैं हम। हमें नित-स्पंदित हो रही जिंदगी की ही तो तलाश रही है!
जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
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