शिवोहम् शिवोहम् । हर-हर महादेव।शिव-शक्ति के मिलन का मुहुर्त।शक्ति में शिवत्व का और शिव में शक्ति के अधिष्ठान का मुहुर्त।संयोग कि विगत दो दशकों से अपने यहाँ भी धूम मचाए हुए 'वैलेंटाइन्स डे' भी इस साल आज ही के दिन है।प्रेम, मांसल प्रेम, का प्रतीक बन चुके इस 'दिवस' का इस बार आज के दिन आना, इसे 'प्रेम-दिवस' कहलाने का हकदार भी बना रहा है। प्रेम के पंथ से गुजरते हुए; देह की गली से चलकर आत्मा तक की यात्रा संपन्न करते हुए, भी कोई 'शिवोहम्' की अनुभूति के धरातल पर पहुँच सकता है। हाँ, प्रेम की उत्कटता, दीवानगी या बावलापन इसकी पूर्व शर्त है।'कुमारसंभवम्' बहुत प्रासंगिक है, आज भी।'सहजिया संप्रदाय' में भी इस उत्कटता को ही शिवत्व (मोक्ष) की प्राप्ति का मार्ग माना गया था।
जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
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