पिछले कुछ महीनों से कोस रहा था खुद को कि सारा फेसबुक क्रांति करने में लगा हुआ है और मैं कविताओं या ग़ज़लों से क्रान्ति ला रहा हूँ ! आज सोचा चलो एक बार हुलक लेते हैं क्योंकि, अबतक तो फुल पावर से क्रांति आ चुकी होगी। अरे बाबा, देश तो एकदम्मे से बदल चुका है। जिसे देखो वही देश बदलने में लगा हुआ है। अधिकांश क्रांतिकारी भगवा लपेटकर और हुज़ूर को माई-बाप मानकर, तो कुछ भगवा को कोसकर ही सही, सब्भे अमेरिका को पछाड़ने में लगे हुए हैं, क्योंकि, हुजूर के आने के बाद अब चीन की तो कोई औकात ही नह...
जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
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