ग़ज़ल बे-बहर {नज़्म ही मेरी आवाज़ है} ================ अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय 09871603621 1. (2212 2212 2212 212) ढहने लगी ईमारतें ----------------------------- ढहते गए सारे मकां, जलती फ़सल खलिहान में खोजूँ कहाँ मैं आदमी, बस भीड़ है दालान में। करते रहे हम कोशिशें, उनको बताने की सदा रखते नहीं कुछ फ़ासले, इंसान वो भगवान में। पोखर सभी थे भर चुके, हम रह गए पर फिर वहीं सब लौट आए छू तरल, तल आप के फ़रमान में। रातें कटे ना चैन से, आती नहीं है नींद अब होने लगी बेजान भी, जम्हूरियत मैदान में। बीती कहानी भर नहीं, जज्बा तिरा था मीत वह अपनों भरी दुनिया यही, थी बात कुछ मुस्कान में। कैसे उसे दें छोड़ जो, दे जिंदगी का हौसला उलफ़त “अमर” अहसास है, बसता नहीं शैतान में। 2. वो सियासत सब दिन खूब किया करते हैं ....................................................... अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 वो सियासत सब दिन, खूब किया करते हैं राम को रख गिरवी, आज जिया करते हैं। रहनुमाई करने, का वो करते दावा गौर से देख हमें, लूट लिया करते हैं। जिन्दग...
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