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ग़मों का बोझ यूं ढोता (ग़ज़ल)

ग़मों का बोझ यूँ ढ़ोता कि मैं हूँ प्यार में पागल पता मुझको तो कुछ होता कि मैं हूँ प्यार में पागल नदी फिर प्यार की उमड़ी बहाती जा रही मुझको लगाऊँ बाढ़ में गोता कि मैं हूँ प्यार में पागल महकती साँस थी तेरी बहकता दिल भी था मेरा तो कैसै चैन से सोता कि मैं हूँ प्यार में पागल फड़कते सुर्ख़ लब तेरे छलकते नैन भी मेरे यूँ ही मन मैल मैं धोता कि मैं हूँ प्यार में पागल बदन अब भी सुलगता है नशा जब प्यार का छाता पुरानी याद में खोता कि मैं हूँ प्यार में पागल शिकायत है उन्हें मुझसे कि क्यों मैं दूर हूँ उनसे अकेला ही मैं क्यों रोता कि मैं हूँ प्यार में पागल उगेगी बेल जहरीली अगर ये जानता साथी कहो फिर बीज क्यों बोता कि मैं हूँ प्यार में पागल 'अमर' संसार है दुखमय मगर सुख नाम है तेरा तेरे ही नाम में खोता कि मैं हूँ प्यार में पागल

इस चुनावी खेल में (ग़ज़ल)

इस चुनावी खेल में बस आग की बरसात होगी ज़ह्र फैलाते हुए दिन नफ़रतों की रात होगी कब सुहानी सुब्ह होगी जगमगाती रात होगी सौ सुनहरे ख़्वाब की कब सच कोई भी बात होगी रात को वह दिन कहे है कैसे दिल माने इसे पर आइना सच का दिखाने की किसे औकात होगी देखकर तेवर तुम्हारे अब यही लगने लगा है अम्न होगा या न होगा लूट अब दिन-रात होगी चाँदनी रोती रहेगी चाँद भी तन्हा रहेगा हसरतों की सिसकियाँ या अश्क़ की बारात होगी आँच मद्धम ही सही पर कोई लौ तो जल रही है मत बुझाना इस दिये को फिर से रोशन रात होगी धूप मीठी है 'अमर' तू खोल मन की खिड़कियों को मुस्कुराने दिल लगा क्यों कुछ न कुछ तो बात होगी

ज़िंदगी की शाम में (ग़ज़ल)

ज़िंदगी की शाम में इक़रार मैंने कर लिया है कर लिया तो कर लिया है प्यार मैंने कर लिया है उम्र भर का साथ है कोई बता दो हमसफ़र को हारकर दिल प्रेम का व्यापार मैंने कर लिया है सख़्त है जंजीर से भी प्यार की यह डोर समझो बेड़ियाँ टूटें नहीं तय यार मैंने कर लिया है भावना की बाढ़ तुझमें तू उफनती सी नदी हो बाढ़ में बहकर नदी को पार मैंने कर लिया है इस उलटबाँसी की धुन को भी 'अमर' समझा करो कुछ किसलिये खुद से ही अब तक़रार मैंने कर लिया है

इक सुनामी नफ़रतों की (ग़ज़ल)

इक सुनामी नफ़रतों की फिर उठाते वो रहे सब्र की क्या इंतिहाँ है आज़माते वो रहे इस तरह खेला उन्होंने नफ़रतों का खेल है तोड़कर दिल अब मुरीदों को रुलाते वो रहे मुद्दतों चलता रहा था ये मुसलसल सिलसिला राज़ जबसे खुल गया नज़रें झुकाते वो रहे प्यार की ठंडी हवा ने फिर से सुलगा दी है आग जल रहा था जो जिग़र उसको जलाते वो रहे फूल की खुशबू 'अमर' अब फैलती कैसे कहो उम्र भर काटों से ही आँगन सजाते वो रहे

तू वफ़ा कर न कर ज़िंदगी (ग़ज़ल)

तू वफ़ा कर न कर ज़िंदगी जी रहा मैं मग़र ज़िंदगी हर दिशा कह रही है मुझे हादसों का सफ़र जिंदगी कुछ मुझे भी पता तो चले जा रही है किधर ज़िंदगी रोज मैं दे रहा इम्तिहाँ इम्तिहाँ है अगर ज़िंदगी चल रहीं तेज हैं आँधियां पर अडिग है शजर ज़िंदगी छँट रही स्याह शब देखिये सुर्ख़ सी हर सहर ज़िंदगी लह्र में तैरना सीख़ ले हर तरफ़ है भँवर ज़िंदगी हादसे सिर्फ़ हैं हादसे टूट मत इस क़दर ज़िंदगी हार क्या जीत क्या सोच मत हर घड़ी है समर ज़िंदगी वक़्त का फैसला मान तू कह रही है 'अमर' ज़िंदगी 1 Mohan Kumar Sinha

झूठ है सब (ग़ज़ल)

झूठ है सब ये कहा कब? होश आया लुट गया जब दूर थे जो पास हैं अब अब तो मेरा प्यार मज़हब रह के चुप तू देख करतब बँट रही है मुफ़्त मनसब हँस रहे हो बंद कर लब हर किसी को देखता रब राज जब था फ़िक्र थी तब अब 'अमर' क्या चुप का मतलब कमें

बताऊँ किसे मैं (ग़ज़ल)

बताऊँ किसे मैं हुआ क्या मुझे है पता कुछ तो हो फ़िक्र किसकी किसे है निकलती नहीं जाँ न ज़िंदा हूँ मैं अब ख़बर ये दबी है ख़बर क्या तुझे है धुआँ ही धुआँ है नज़र है जहाँ तक मुझे देखना फिर धुआँ कब बुझे है मेरी बेबसी हँस रही है मुझी पर ख़ता किसने की है सजा दी किसे है छिपाता तुम्हीं से जताता तुम्हीं को दिवाना 'अमर' आज खुद पे हँसे है 17 Viraat Tiwari, Dinesh Adlakha और 15 अन्य लोग