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चराग जलाकर आया हूँ

चराग जलाकर आया हूँ ------------------------- अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय लम्बी स्याह रात में इक चराग जलाकर आया हूँ मौत के आगोश से जिन्दगी को छीनकर लाया हूँ। विवश-बेचैन हो जो उमड़े थे मजबूरियों के आँसू प्यार की जुम्बिशों से आज उन्हें सोख आया हूँ। निराला जिन्दगी का सफर रहती नहीं तन्हा डगर हर-हाल उम्मीदों की लहराती पौध रोप आया हूँ। चलो चलें गांव अपने अभी जिन्दगी जिन्दा है वहाँ कई बरस पहले जहाँ कुछ शरारतें छोड़ आया हूँ। दिखाया न तुमको कभी दरकती छत की टपकती बूंदें लेकिन खिलती है जिन्दगी यहाँ ये राज बताने आया हूँ। कोहरा घना है माना 'अमर' कब तलक रुकता उजाला बादलों को चीर निकलता आफताब देखने आया हूँ।

सफर बाकी है अभी

सफर बाकी है अभी ---------------------- अमर पंकज (डा अमरनाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय सफर बाकी है अभी अभी बाकी है जिंदगी से अभिसार कह रहा हूं तुम्हीं से बार-बार सुन रही हो न ऐ मृत्यु के आगार। अभी तो अक्षुण्ण है जीवन-ऊष्मा का अनंत पारावार। सुनो तुम जीवन की चुनौती भरी ललकार हमेशा भारी पड़ेगा तुम्हारे क्रूर-दानवी अट्टहास पर हमारा मधुरिम-संसार। साक्षी का कत्थक-नृत्य सोनू का छाया-चित्र मेरी कविता की तान और प्रिय की मुस्कान नित दे रहे हमें अक्षत-जीवन का शाश्वत वरदान। मेरे गाँव को तो देखा है तुमने वहाँ देखा होगा हर पल जीवन के स्पन्दन को तुम्हारे क्रूर-प्रहार निरन्तर सहकर भी बेसुध हो नर्तन करते 'चिरहास-अश्रुमय' मधुमय जीवन का संसार। नीमगाछ-छाँव तले निश्चिन्त लेटकर बतियाते बेसिर-पैर की बातें करते गाँव से लेकर अमेरिका की राजनीति की नब्ज टटोलते ब्राह्मणत्व के दर्प से गर्वित स्वयं को दुनिया का सबसे बुद्धिमान विचारवान-संस्कारवान चरित्रवान प्राणी जतलाते दुर्लभ स्वाभिमान की थाती फोकट में संजोते एक ही धोती सुखाते-पहनते जनेऊ छूकर नित्य अपनी अखंड पवित्रता की कसमें खाते नहीं अघाते हंस...