सोमवार, 1 अक्तूबर 2018


बैठे हैं हम भी इम्तिहाँ में
फिर हैं खिले फूल गुलिस्ताँ में
दिल में हलचल तो है लेकिन
आवाज़ नहीं आज जुबाँ में
तनहाई का आलम क्यों है
रहते जब हैं सब इसी मकाँ में
ऐ दिल मत हो तू उदास कहीं
छा जाए न उदासी जहाँ में
शोख निगाहों की ये खता 'अमर'
कैसे सुकूँ मिले दर्दे-निहाँ में

बुधवार, 1 अगस्त 2018

2212 1212 22
ख्वाब में ही झलक दिखाते हैं
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621
ख्वाब में ही झलक दिखाते हैं
पर वही रोज याद आते हैं।
छोड़ दी जिनकी सोहबत मैंने
रात भर वो मुझे जगाते हैं
खासियत का पता चला उनका
खास को ही मगर रुलाते हैं।
प्यार या जंग में करो कुछ भी
मानकर प्यार से सताते हैं।
पागलों की तरह हैं दीवाने
आप क्यों इस तरह लुभाते हैं।
खेल क्या खेलते 'अमर' तुम हो
सबको आईना हम दिखाते हैं।