शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

आपका कहा अनकहा हम कैसे करें
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आपका कहा अनकहा हम कैसे करें
सोचते आप क्या बयाँ हम कैसे करें।
कहते हैं सभी कि सियासी कथन है
डँस रही जिंदगी जुदा हम कैसे करें।
सियासत चढ़ी बनकर दिमागी बुखार
धड़कनें बढ़ गई हैं बंद हम कैसे करें।
मुश्किल से सीखा है नज़रों को मिलाना
अपनी ही नज़र से जफ़ा हम कैसे करें।
दिल है तड़पता सिर्फ उलफत ही में नहीं
चू रहे अश्क 'अमर' जाया हम कैसे करें।

दह़ान-ए-ज़िस्म जबसे रिसने लगा
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दहान-ए-ज़िस्म जबसे रिसने लगा
अज़ीब सुकूँ फिर से मिलने लगा।
ज़िगर चाक-चाक होता रहा लेकिन
शब़-ए-ग़म से बेखौफ गुजरने लगा।
ज़र्द पड़ गए ज़िस्म की पासबानी ये
रूहे-फ़ना को कब़ा से लपेटने लगा।
भटके हैं उम्र भर दिल्ली की सड़कों पे
पहचान सदा-ए-ज़रस की करने लगा।
न पढ़ा हर्फे-इबारत नसीब की 'अमर'
करीब को यूँ करीब से समझने लगा।

उनकी तो है बात अलग
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उनकी है हर बात अलग और है आवाज़ अलग
बयाँ करें क्या उनका मुखातीबे-अंदाज़ अलग।
हक़ जताकर टोकते और पूछते भी हैं वो हरदम
बिंदास उनकी दोस्ती रिश्ता-ए-आगाज अलग।
बंद कर आँखेँ सुनते ग़ज़ल फ़िर कहते लाजवाब
छू गए अशआर हैं सुखनवर के अल्फ़ाज़ अलग।
अक्सर जताते वो नामुमकिन नहीं लांघना पहाड़
हार जज़्ब करने वाले भी होते हैं जांबाज अलग।
निकालते संगीत सुरीला टूटे हुए साज से 'अमर’
झूमकर गाते ग़ज़ल ज़िदगी के सब राज अलग।