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भटकते हुए खयालात हैं कि चाहतों की बरसात

भटकते हुए खयालात हैं कि चाहतों की बरसात ------------------------------------------------------------ अमर पंकज ( डॉ अमर नाथ झा ) मोबाईल-- 9871603621 भटकते हुए खयालात हैं कि चाहतों की बरसात अधमुंदी पलकों की हुई अलसाई भोर से मुलाकात। परछाई ढूँढती रही वही बिछड़ा हुआ ठिकाना खुद को ही बाँटता रहा बनके बेबसी की सौगात। मुझसे सवाल करती रही मेरी ही सर्द साँसें भटकती हुई रूह चुन रही बिखरे हुए लम्हात। हँसते रहे अश्क़ सुस्त धड़कनों से खेलकर सहरा-ए-जिस्म देख भड़के ठहरे हुए ज़ज्ब़ात। चलकर आया समंदर दरिया से मिलने गाँव खो गया चाँद 'अमर' ढूँढता आफताब सारी रात।

नज़्म ही मेरी आवाज है

मेरी नज़्म ही मेरी आवाज़ है ============================= अमर पंकज ( डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय 09871603621 1. एक-एक कर ढ़हने लगीं ईमारतें ........................................... एक-एक कर ढ़हने लगी ईमारतें सारी रेत पर बनी लगती हैं टूटी हूई इन बस्तियों में अब आदमी नहीं भीड़ ही दिखती है। उम्र भर कोशिश करते रहे हम धरोहरों को बचाए रखने की मगर उजड़ गए गांवों की टीस यहाँ कहां किसी में दिखती है। लबालब पोखर में पेड़ की फुनगी चढ़ कूद जाने की कशिश बंद-साँसों गोता लगा तलहटी छूने की फितरत में दिखती है। जानता हूँ जम्हुरियत की फसल अब ईंवीएम में लहराने लगी धूर्त्तों को मिल गई चैन उनकी बेफ़िक्री की नींद में दिखती है। कैसे मर जाने दूँ जज़्बात और ज़िन्दा रहने का हौसला ' अमर ' पांडवों की साधना की परिणति ही तो महाभारत में दिखती है। 2. भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं ..................................................... वो हिन्दू-मुसलमां और मंदिर-मसजिद की सियासत किया करते हैं अक्सर धरम के नाम पर भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं । ...