ग़ज़ल बे-बहर (नज़्म ही मेरी आवाज़ है )
ग़ज़ल बे-बहर {नज़्म ही मेरी आवाज़ है} ================ अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय 09871603621 1. एक-एक कर ढ़हने लगीं ईमारतें ........................................... एक-एक कर ढ़हने लगी ईमारतें बनी हैं रेत में दिखती हैं अब आदमी कहाँ भीड़ उजड़ी इन बस्तियों में दिखती है। उम्र भर कोशिश करते रहे धरोहरों को बचाए रखने की पर उजड़े गांवों की टीस यहाँ कहां किसी में दिखती है। लबालब पोखर में पेड़ की फुनगी चढ़ कूदने की कशिश बंद-साँसों गोता लगा तलहटी छूने वालों में दिखती है। पता है जम्हुरियत की फसल अब ईंवीएम में लहराने लगी धूर्त्तों को मिली चैन उनकी बेफ़िक्री की नींद में दिखती है। ज़िन्दगी की जंग जीतने का ज़ज्बा बीती कहानी भर नहीं अपनों की मुस्कुराहट अब आभासी दुनिया में दिखती है। कैसे मर जाने दूँ जज़्बात ज़िन्दा रहने का हौसला 'अमर' पांडवों की साधना की परिणति महाभारत में दिखती है। 2. भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं ..................................................... वो हिन्दू-मुसलमां मंदिर-मसजिद की सियासत किया करते हैं धरम के नाम पर भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं । ये घि...