वक़्त का फ़रमान {अब तक की मेरी 75 ग़ज़लें (बा-बह्र)} अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 (1) बात बताते वो कब हैं --------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल - 9871603621 बात बताते वो कब हैं, पर लोग सभी पहचान गए काँप रहे जों लब उनके, मन में क्या है सब जान गए। नजरें उनपर ही ठहरी, मानो वो मूरत हो कोई साँचे में ढला मस्त बदन, कह सारे मेहरबान गए। क्या कहता था वक़्त कहाँ फिसली क्यों उनपर आज नजर कैसे पार करें फिसलन, मन ही मन हम कुछ ठान गए। रोज उड़ा करता लेकिन, उडता हूँ बनकर राख यहाँ सूँघ महक फैली जो है, ये कदरदान अब जान गए। आज छिड़ी जब बात अगर, तो फिर हमको भी कहने दो टूटे तारे बिखरे हैं, पर चाँद के कब अरमान गए। कौन उड़ाता परचम झूठे वादे का हर ओर "अमर" अब लमहों की बात रही, तेरा भी सच सब जान गए। (2) भागने का सब -------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 भागने का सबब जान लेते। हाँफती साँस पहचान लेते। आज टूटे सितारे बने हम चाँद से रार न...
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