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वो सुबह कभी न कभी तो आयेगी...........

आम लोगों के धैर्य की परिक्षा लेने में सभी लगे हुए से लगते हैं-- सरकार, विपक्ष, अन्य राजनीतिक दल, बुद्धिजीवी, पत्रकार, ट्रेड-यूनियन के नेतागण, छात्र-संगठनों के प्रतिनिधि, और यहाँ तक कि आर. डब्ल्यू. ए. के नेतागण भी---सब के सब. ऐसा लगता है कि अंधी सुरंग में हम सब बेतहासा दौड़ते चले जा रहे हैं, बिना आगे-पीछे  देखे. सिर्फ गाल बजाने वाले, आज के सन्दर्भों में, कुछ से कुछ उलजलूल विषयों पर तथाकथित आधिकारिक रूप से की-बोर्ड पर अंगुलियाँ नचाने वाले अब बहस- मुबाहिसा में उल्लेखनीय बन रहे हैं. "उष्ट्रानाम विवाहेषु, गर्धवाः गीत गायकाः , परस्परं प्रशिस्यन्ति, अहो रूपं अहो ध्वनि". इस दौर में किसने कितना जलाया खुद को संघर्षों की आग में, कितना तप किया है किसी मुद्दे पर जबान खोलने के पहले, अगर इन तथ्यों की पड़ताल करें तो यहाँ अधिकतर विद्वान् नेटवर्किंग और चापलूसी की ही उपज साबित होंगे. कभी जाति के नाम पर, तो कभी क्षेत्र के नाम पर. कभी विचारधारा के नाम पर तो कभी निजी सेवा-भक्ति के नाम पर, लोग अपना-अपना जुगाड़ मात्र बैठाते आये हैं. यह भयावह स्थिति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को लीलती जा रही है. लो...

इतिहासकारों को इस तस्वीर में लिखी इबारत पढ़नी ही होगी

मैं चुप हूँ क्योंकि चुप रहना ही ठीक है. बात न सिर्फ रामानुजन की है नहीं राम कथा की. बात इतिहास की व्याख्या पर वर्चस्व की है. हम क्रन्तिकारी और तुम प्रतिक्रांतिकारी बनाम हम सच्चे भारतीय और तुम नकली भारतीय के उद्घोषकों के बीच चल रहे इस उठापटक में न तो कोई तीसरी आवाज़ है और न ही कोई उस आवाज़ का संज्ञान लेने वाला. सच तो यह है की इतिहास आज दो विचारधारों के द्वंद्व में लहुलुहान हो रहा है. तटस्थ होकर इति...हास की मीमांशा करने के दिन लड़ गए से लगते हैं. पर जो अपने सच से आँखें नहीं मिला सकता वह किसी भी चुनौती का सामना नहीं कर सकता, चाहे चुनौती भ्रष्टाचार की हो या नक्सली हिंसा की या फिर साम्प्रदायिकता की ही क्यों न हो? इतिहासकारों को इस तस्वीर में लिखी इबारत पढ़नी ही होगी. संस्कृति के सवाल को बहुत सनसनीखेज बनाकर दोनों खेमों के पहलवान सिर्फ संस्कृति हो ही आहत कर रहे हैं.  मैं व्यक्तिगत रूप से इसलिए भी दुखी हूँ क्योंकि दिल्लीविश्वविद्यालय में जब धर्म और संस्कृति के विषय इतिहास में निषिद्ध थे तब भी मैं उन चाँद लोगों में से था जो इस विषय पर खुलकर बात करने की सार्वजनिक वकालत करता था. इसकी अंति...

इतिहास आज दो विचारधारों के द्वंद्व में लहुलुहान हो रहा है

मैं चुप हूँ क्योंकि चुप रहना ही ठीक है. बात न सिर्फ रामानुजन की है नहीं राम कथा की. बात इतिहास की व्याख्या पर वर्चस्व की है. हम क्रन्तिकारी और तुम प्रतिक्रांतिकारी बनाम हम सच्चे भारतीय और तुम नकली भारतीय के उद्घोषकों के बीच चल रहे इस उठापटक में न तो कोई तीसरी आवाज़ है और न ही कोई उस आवाज़ का संज्ञान लेने वाला. सच तो यह है की इतिहास आज दो विचारधारों के द्वंद्व में लहुलुहान हो रहा है. तटस्थ होकर इति...हास की मीमांशा करने के दिन लड़ गए से लगते हैं. पर जो अपने सच से आँखें नहीं मिला सकता वह किसी भी चुनौती का सामना नहीं कर सकता, चाहे चुनौती भ्रष्टाचार की हो या नक्सली हिंसा की या फिर साम्प्रदायिकता की ही क्यों न हो? इतिहासकारों को इस तस्वीर में लिखी इबारत पढ़नी ही होगी. संस्कृति के सवाल को बहुत सनसनीखेज बनाकर दोनों खेमों के पहलवान सिर्फ संस्कृति हो ही आहत कर रहे हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से इसलिए भी दुखी हूँ क्योंकि दिल्लीविश्वविद्यालय में जब धर्म और संस्कृति के विषय इतिहास में निषिद्ध थे तब भी मैं उन चाँद लोगों में से था जो इस विषय पर खुलकर बात करने की सार्वजनिक वकालत करता था. इसकी अंतिम औ...

पूरा देश अत्मविश्वास से लबरेज है---वो सुबह कभी तो आयेगी

अब अण्णा का अनशन समाप्त हुआ. अण्णा के शब्दों मे स्थगित हुआ है, समाप्त नहीं. बहुत कुछ देखा-सुना-समझा, पूरे दौर में. रोज रामलीला मैदान गया. डूटा के चुनाव के दिन भी गया अपनी इसी समझ को बढाने हेतु. लिखा भी. लगतार लिखा, कुछ छपा, बहुत नहीं छपा. हां वेब साईट पर जरूर पोस्ट करता रहा. अनुभव की दुनिया जरूर स्मृद्ध हुयी. अगर हमें नया संसार बनाना है तो बहुत कुछ करना होगा. नये भारत के निर्माण के लिये अभी बहुत कुछ योगदान करना होगा. सवाधीनता अन्दोलन के इस चौथे दौर मे हमें कयी असहज सवाल भी पू्छने होंगे, अपने आप से भी और वेसे तमाम लोगों से, जो नया समाज बनाने की प्रक्रिया मे लगे हुए हैं--अरसे से. कयी नवीन मानदंड गढने होंगे, कयी पुरातन मूल्यों को भी अपनाना होगा. ताकत परम्परा से लेनी होगी, समझ नयी बनानी होगी. मौजूदा अन्दोलन की कमजोरियों से भी सबक लेना होगा और इसकी शक्ति से अपना खोया अत्मविश्वास हसिल करना होगा. पूरा देश अत्मविश्वास से लबरेज है---वो सुबह कभी तो आयेगी.

सिर्फ जन-लोकपल--उससे ज्यादा अभी नहीं, उससे कम कभी नहीं

अमरनाथ झा असोसिएट प्रोफ़ेसर, स्वामी श्रद्धानंद कालेज, दिल्ली विश्वविद्यलय स्वाधीनता दिवस तो हर साल मनाया जाता है, पर इस वर्ष का स्वाधीनता दिवस एक ऐसे क्रांतिकारी उभार के साथ आया जिसने देश को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है. इस १५ अगस्त को देश की आन-बान-शान पर मर मिटने वाले अमर बलिदानियों की याद ने पिछले कुछ महीनो से भ्रष्टाचार के विरोध में उभर रही जन भावनाओं को राष्ट्रवादी रंग में रंग दिया. और जब अन्ना को १६ अगस्त से उनके घोषित अनशन और आन्दोलन को रोकने के लए गिरफ्तार कर लिया गया तो पूरे देश में आन्दोलनकारी भावनाएं चरम पर पहुँच गयी और आज अन्ना सही अर्थों में जन-नायक हो गए. पूरी ना सही, अधूरी ही सही, पर मिली तो थी आज़ादी ही १५ अगस्त १९४७ को. वर्षों की तपस्या, हजारों के बलिदान, और लाखों की कुर्बानियों के बाद सदियों की गुलमी से मुक्ति के इस पवित्र दिवस को लोग अपने अपने स्तर पर अमर स्वाधीनता सेनानियों को नमन करते हुए मना रहे थे. यह ठीक है कि देश में सबकुछ ठीक नहीं है और हमें अभी बहुत लम्बा संघर्ष करना है--सम्पूर्ण स्वाधीनता के लिये. गांधी के सपनों को साकार करने के लिये और वास्तव म...

अद्भुत शिक्षक को मेरा कोटिशः अंतिम प्रणाम.

प्रोफ़ेसर राम शरण शर्मा की मृत्य भारतीय इतिहास लेखन की ही नहीं बल्कि प्रगतिशील चिन्तन की अपूरणीय क्षति है. लगातार कई पीढ़ियों को इतिहास की उस अवधारण से, जो भारत में डी.डी.कोशाम्बी और इंगलैंड में ए.एल .बाशम विकसित कर  रहे थे, के मूल तत्वों से बनी थी वे पिछले आधे दशक से भी ज्यादा समय से परिचित करा रहे थे. आज ४-४ पीढ़ियों के लोग उनके विद्यार्थी बनाने का गौरव हासिल कर चुके है और उनकी अगाध विद्वता से सनी हुई अद्भुत शिक्षण शैली से से इतिहास की समझ बनाने में सफल हुए हैं. १९८४-१९८६ में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास , प्राचीन इतिहास में एम. ए. करने के दौर में मुझे भी उनका छात्र बनाने का गौरव मिला था. हालाँकि वे सेवा निवृत हो चुके थे परन्तु प्रोफ़ेसर डी.एन. झा के निवेदन पर तथा हमलोगों के अनुनय -विनय पर उन्होंने अपने आवास पर ही एक पेपर हमें पढाया  था. हमारा बैच उनसे   पढ़ने वाले विद्यार्थियों का आख़िरी बैच था. सचमुच हमने  उनके जैसे महान विद्वान और उत्कृष्ट शिक्षक के विद्यार्थी के रूप में जीवन   की अमूल्य निधि हासिल की है.  प्रोफ़ेसर राम शरण शर्मा के सच...

सिर्फ जन लोक पल विधेयक--उससे कम कुछ भी नहीं

सिर्फ जन लोक पल विधेयक--उससे कम कुछ भी नहीं स्वाधीनता दिवस तो हर साल मनाया जाता है , पर इस वर्ष का स्वाधीनता दिवस एक ऐसे क्रांतिकारी उभार   के साथ आया जिसने देश को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है. इस १५ अगस्त को देश की आन बान शान पर मर मिटने वाले अमर बलिदानियों की याद ने पिछले कुछ महीनो से भ्रष्टाचार के विरोध में उभर रही जन   भावनाओं को राष्ट्रवादी रंग में रंग दिया. और जब अन्ना को  १६ अगस्त से उनके   घोषित अनशन और आन्दोलन को रोकने के लए गिरफ्तार कर लिया गया तो पूरे देश में आन्दोलनकारी भावनाएं चरम पर   पहुँच गयी और आज अन्ना सही अर्थों में जन-नायक हो गए.   पूरी ना सही , अधूरी ही सही , पर मिली तो थी आज़ादी ही १५ अगस्त १९४७ को .   वर्षों की तपस्या , हजारों के बलिदान , और लाखों की कुर्बानी के बाद सदियों की गुलमी से मुक्ति के इस पवित्र   दिन को लोग अपने अपने स्तर पर अमर स्वाधीनता सेनानियों को नमन करते हुए मना रहे थे . यह ठीक है कि देश में सबकुछ ठीक नहीं है और हमें अभी बहुत लम्बा संघर्ष करना है--सम्पूर्ण स्वाधीनता के लिये. गांधी के सपनों को...