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नज़रें मिलाने की इज़ाजत --------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा ) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 नज़रें मिलाने की इज़ाजत अब कहाँ पलकें झुकाने की इज़ाजत अब कहाँ। दिल को चुकाना तो पड़ेगा मोल कुछ लब को हिलाने की इज़ाजत अब कहाँ। इज़हार तुमसे प्यार का कैसे करें दिल भी लगाने की इज़ाजत अब कहाँ। तुम भी गढ़ो उनके कसीद़े बैठकर मन की सुनाने की इज़ाजत अब कहाँ। कैसे कहे कोई ग़ज़ल भी इस तरह सच को बताने की इज़ाजत अब कहाँ। फैला अँधेरा हर तरफ से है मग़र दीया जलाने की इज़ाजत अब कहाँ। देखो 'अमर' जलवे सियास़त के सभी नफ़रत मिटाने की इज़ाजत अब कहाँ।
कैद करने चला है ------------------------ अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 कैद करने चला है हवाओं को वो अनसुनी कर रहा सब सद़ाओं को वो। हुक्म है मौज़ भी ना मचलकर बहे हर समय तौलता है वफ़ाओं को वो। चाहती हो बरसना, इज़ाज़त तो लो कह रहा है हमेशा घटाओं को वो। हर जगह गूँजती है उसी की जुबाँ बाँधना चाहता है दिशाओं को वो। अब चलीं आँधियाँ तो लगा चौंकने दोष देने लगा फिर फज़ाओं को वो जब भड़कने लगी जंग की आग तो कोसने अब लगा शूरमाओं को वो। लुट रही आबरू बेटियों की जहाँ मुँह दिखाए 'अमर' कैसे माँओं को वो।
किसको बताएँ ------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) मोबाइल-9871603622 किसको बताएँ क्यों जहर जीवन में अब ये भर गया जलती हुई इस आग में वह राख सब कुछ कर गया। वादे सभी हैँ खोखले, जब भी हवा थी कह रही पर था समां ऐसा बना तब बिन कहे जग मर गया। थी जब चली उसकी सुनामी बाँध भी टूटे कई चुपचाप सब सहते रहे अब सच कहें अवसर गया। रणबाँकुरे आगे बढ़े हैं जंग फिर से छिड़ गई सैलाब भी अब थम रहा तो फिर दिलों से डर गया। चलती रहीं सब कोशिशें पर लोग अब बहके नहीं काँटे डगर में हर तरफ काँटों से मैं मिलकर गया। कब तक चलेंगे खोटे सिक्के रो रहा बाजार भी सपने दिखाए थे बहुत अब तो 'अमर' जी भर गया।
कोई कैसे समझे ---------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा ) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल - 9871603621 कोई कैसे समझे मुसीबत हमारी, मुझे तो पता है विवशता तुम्हारी। सिमटती हुई रौशनी के सहारे सफ़र है तुम्हारा अँधेरों में जारी। कभी मत कहो ये कि मजबूरियाँ हैं अँधेरों से लड़ने की आई है बारी। अँधेरों से लड़ते रहे तुम अकेले सभी शूरमाओं पे तुम ही हो भारी। अँधेरों से कह दो सिमट जाए खुद में च़रागों की लौ से अमावस भी हारी। सुबह हो रही है परिन्दे भी चहके हवाएँ दिखाएँ जो फिर बेकरारी सलीके से उसने दिया सबको धोखा सफ़र मेँ है बेचैन हर इक सवारी । ग़ज़ल कह रहे हो 'अमर' उस जगह तुम लुटी जा रही है जहाँ आज नारी।
उठे नैन फ़िर से ------------------------ अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय) मोबाइल - 9871603621 उठे नैन फ़िर से मग़र आज बिन खिले जहाँ तक नज़र जाए बेचैन सब मिले। अँधेरों से लड़ते अकेले रहे हम सभी शूरमाओं के जो लब़ थे सिले। अँधेरों से कह दो सिमट जाए ख़ुद में चराग़ों की लौ से कभी ना करे गिले। सुबह फिर हुई औ परिन्दे भी चहके चली है हवा जो नई तो वो भी हिले। बनाया है उसने सलीके से उल्लू करम सबके अपने मिलेंगे कभी सिले। हँसी में 'अमर' तुम ग़ज़ल कह रहे हो समेटे हुए ग़म सभी कब सुकूँ मिले।
ढल रही अब शाम --------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 ढल रही अब शाम तो फ़िर देखता हूँ प्यार को ढह रही दीवार थी रोके नदी की धार को। उठ रहा था जो बवंडर इस समंदर में कभी बन गया है वो भँवर अब देखकर पतवार को जो दिखाती जिंदगी अब देख मत चुपचाप वह ना मिले साहिल कभी तो चूम ले मँझ धार को। हो सके तो आज पढ़ तुम ज़र्द रुख़ के हर्फ़ को सुर्ख़ गालों ने छुपाया दुख के पारा वार को। कशमकश की इस ख़लिश में चाँद गर मिलता मुझे पूछता ये दाग क्यों है क्या कहें संसार को। चाहते हो कैद करना देह की इस गंध को जज्ब कर पहले 'अमर' तुम आँसुओं की धार को
ब़ुत बनाकर ----------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 ब़ुत बनाकर रोज ही तुम तोड़ते हो कर चुके जिसको दफ़न क्यों कोड़ते हो। अब बता दो कौन सी बाक़ी कसक है आज फिर क्यों सर्द साँसें छोड़ते हो। ख़्वाब सबने तो सुहाने ही दिखाए बन गई नासूर यादें फोड़ते हो। एक मन मंदिर बना लो उस जगह तुम बैठकर दिल से जहाँ दिल जोड़ते हो। फिक्र कब तक डर अजाने का करोगे हादसों की सोच क्यों मुँह मोड़ते हो। बेस़बब तो नैन फिर छलके नहीं हैं क्यों 'अमर' ऐसे जिग़र झिँझोड़ते हो।