रात देर से आया.पहली बार दिल्ली से आगरा और उससे भी आगे सेवाल अहीर गाँव गया ख़ुद गाड़ी चलते हुए .सज्जन और दिल से मदद करने वाले लोग आज भी बहुत हैं.लेकिन राजनीति के खिलाड़ियों नि अपनी चाल होती है.परन्तु मैं संतुष्ट हूँ की मैं अपना काम कर रहा हूँ.पूनम भी मेरा पूरा साथ दे रही है.मेरे साथ गयी-आयी.थक कर सोई है.साक्षी स्कूल गई तो मैं उठकर ब्लॉग खोलकर बैठ गया.सूरज जी स्वस्थ रहते तो इस बार चुनाव जरूर लड़ते.इश्वर शीघ्र उन्हें स्वस्थ बनायें.केंसर जैसी बीमारी पर काबू पाना ईश्वर की कृपा और ख़ुद की जीजीविषा से ही संभव है.अचानक दो महीने में कितना बदल गया सूरज जी का संसार.४ मार्च को सफल ऑपरेशन हो गया.१६ मार्च को घर भी आ गए हैं.अभी ठीक ही हैं.नोर्मल होने में अभी वक्त लगेगा.ईश्वर कृपा करें.केंसर के नाम से दिल दहल जाता है.समीर बाबू कहाँ टिक पाए.गायत्री को इस छोटी सी उम्र में कितना बड़ा दुःख झेलना पड़ रहा है.परन्तु इंसान को तो परिस्थितियों से जूझना ही पड़ता है.प्रत्येक विषम परिस्तिथि में भी सतुलन बनाये रखने वाला ही विजयी होता है.पूज्य बाबूका ने उद्रार में कितना सही लिखा है---रूकने वाला हर चुका है,मंजिल पर ही क्यों न रुके/अविरल चलने vala
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...
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