शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

किधर से चली जिन्दगी किधर जा रही है
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किधर से चली जिन्दगी किधर जा रही है
ना मालूम कहाँ से ऐसी जिया आ रही है।
देखता हूँ सब कुछ पर कुछ दीखता नहीं
आफताब चढ़ रहा उधर घटा छा रही है।
कल कुछ भी नहीं था आज भी कुछ नहीं
किसको पता हवा भी सौगात ला रही है।
जिस्म मचलता रहा और जिगर जल गया
आग को आग अब किस कदर खा रही है।
रोने की सूरत में भी हँसने की आदत उसे
गम और खुशी के गीत बेफिक्र गा रही है।
समा क्या अजब 'अमर' कुछ सूझता नहीं
अंधेरे-उजाले की ये रंगत गजब ढा रही है।

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