शिवोहम् शिवोहम् । हर-हर महादेव।शिव-शक्ति के मिलन का मुहुर्त।शक्ति में शिवत्व का और शिव में शक्ति के अधिष्ठान का मुहुर्त।संयोग कि विगत दो दशकों से अपने यहाँ भी धूम मचाए हुए 'वैलेंटाइन्स डे' भी इस साल आज ही के दिन है।प्रेम, मांसल प्रेम, का प्रतीक बन चुके इस 'दिवस' का इस बार आज के दिन आना, इसे 'प्रेम-दिवस' कहलाने का हकदार भी बना रहा है। प्रेम के पंथ से गुजरते हुए; देह की गली से चलकर आत्मा तक की यात्रा संपन्न करते हुए, भी कोई 'शिवोहम्' की अनुभूति के धरातल पर पहुँच सकता है। हाँ, प्रेम की उत्कटता, दीवानगी या बावलापन इसकी पूर्व शर्त है।'कुमारसंभवम्' बहुत प्रासंगिक है, आज भी।'सहजिया संप्रदाय' में भी इस उत्कटता को ही शिवत्व (मोक्ष) की प्राप्ति का मार्ग माना गया था।
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...
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