पिछले कुछ महीनों से कोस रहा था खुद को कि सारा फेसबुक क्रांति करने में लगा हुआ है और मैं कविताओं या ग़ज़लों से क्रान्ति ला रहा हूँ ! आज सोचा चलो एक बार हुलक लेते हैं क्योंकि, अबतक तो फुल पावर से क्रांति आ चुकी होगी। अरे बाबा, देश तो एकदम्मे से बदल चुका है। जिसे देखो वही देश बदलने में लगा हुआ है। अधिकांश क्रांतिकारी भगवा लपेटकर और हुज़ूर को माई-बाप मानकर, तो कुछ भगवा को कोसकर ही सही, सब्भे अमेरिका को पछाड़ने में लगे हुए हैं, क्योंकि, हुजूर के आने के बाद अब चीन की तो कोई औकात ही नह...
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...
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