कविता की व्याख्या अलग-अलग संदर्भों में और अलग-अलग दृष्टिकोणों से की जा सकती है, परंतु रचना प्रक्रिया और रचयिता की रचना-पूर्व मनःस्थिति की समझ सिर्फ किसी रचनाकार को ही हो सकती है। पाठक-समीक्षक-समालोचक भी स्रष्टा की सृष्टि की रस-धारा में अवगाहन करने वाले सहयात्री होने का अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करते हैं। यही कारण है कि किसी को कोई रचना पसंद आती है तो किसी दूसरे को वही रचना प्रभावित नहीं कर पाती है। लेकिन पसंद-नापसंद से परे, पाठकों की सहभागिता के बाद ही रचना-प्रक्रिया पूर्ण होती है। अतः कोई भी रचना सिर्फ स्वांतःसुखाय के लिए नहीं सृजित होती है। इसीलिए कवि या शायर अपनी कविता या शायरी विनम्रता से पाठकों / श्रोताओं के सम्मुख बार-बार परोसता है। कम से कम मैं तो इसीलिए ऐसा करता हूँ।
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन
नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...
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