(बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन)
फूल ही फूल हैं कब खिले
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621
फूल ही फूल हैं कब खिले
प्यार ही प्यार हैं कब मिले।
पूछ लूँ गर कभी वो रुके
वक़्त से हैं हमें कुछ गिले।
अश्क जो बह गए रात भर
भोर तक वे कुमुद बन खिले।
रूठकर जो गए प्यार था
वगरना बेफ़िकर सब मिले।
शुक्र है कुछ हवा तो चली
सूखते शाख भी अब हिले।
आज तुम मत रहो चुप "अमर"
हिल रहे होठ थे जो सिले।

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