रविवार, 18 मार्च 2018

रोज होते रहे हादसे
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621
रोज होते रहे, हादसे ही मगर
वो नहीं आ सके, बन कभी भी खबर।
आज मायूस सा, तुम खड़े हो जहाँ
गा रहे थे सभी, कल वहीं नाचकर।
हादसों बिन कहाँ, कट रहा वक्त भी
जानते हम बनी, अब कँटीली डगर।
कौन सुनता यहाँ, चीख सच की कभी
बन गया आज तो, सच छुपाना हुनर।
जानते सब मगर, हम जताते नहीं
मौज़ ही बन गई, जिंदगी का भँवर।
है बदल सी गई, कुछ फ़िजा वक़्त की
अश्क की धार भी, रुक गई जो 'अमर'।

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