कोई तो बचा लो
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621
कोई तो बचा लो हैं चाहत के मारे
जला है नशेमन अदावत के मारे।
कोई हद नहीं अपनी दीवानगी की
कहाँ जायें आखिर मुहब्ब़त के मारे।
ये आवारगी का फ़साना हमारा
सुनाएँ किसे हम हैं उल्फ़त के मारे।
सदा दिल की उनके सुनाई पड़ी जब
मचलने लगा दिल मुहब्ब़त के मारे।
निगाहें तुम्हारी उठीं आज हम पर
रहे हम खड़े पर शराफ़त के मारे।
'अमर' आज मंजूर तेरा कहर है
डरेंगे नहीं हम मुसीबत के मारे।

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