क़ुदरत लुभाती जा रही है
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621
क़ुदरत लुभाती जा रही है फिर मुझे।
फ़ितरत रुलाती जा रही है फिर मुझे।
लहरें झुलाती जा रहीं हैं फिर मुझे
यादें बहाती जा रहीं हैं फिर मुझे।
हर दिन मजाज़ी कुफ्र से निस्बत रही
अब क्या बनाती जा रही है फिर मुझे ।
मालिक ने मेरा क्या मुकद्दर लिख दिया
हर शै जताती जा रही है फिर मुझे।
किस खेल में सिमटी रही ये ज़िन्दगी
अब क्या दिखाती जा रही है फिर मुझे।
मिटतीं लकीरें हाथ से हैं क्या कभी
किस्मत सिखाती जा रही है फिर मुझे।
हाकिम 'अमर' खामोश क्यों है इस तरह
चुप्पी सताती जा रही है फिर मुझे।

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