लहरों पर बहते जाना
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621
लहरों पर बहते जाना ही अब भी अच्छा लगता है
हिचकोले खाते बढ़ता हूँ तब भी अच्छा लगता है।
लम्बी स्याह सी रातें गुजरीं और अभी है भोर हुई
देखा थोड़ा निकला सूरज तब भी अच्छा लगता है।
सब दिन तुम जिस राह चले हो मंज़िल मेरी आज उधर
उठता है तूफ़ान बवंडर जब भी अच्छा लगता है।
चलते-चलते थक जाऊँ तो कल की याद दिला देना
तेरे मुँह की लाली का मतलब भी अच्छा लगता है।
हर पल अपना साथ रहे सो दिखती बस तरक़ीब यही
तकती आँखों का तो हर करतब भी अच्छा लगता है।
वक़्त बड़ा बलवान 'अमर' है भरता रहता जख़्मों को
इज़लास-अदालत से ऊपर रब भी अच्छा लगता है।

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