जम्हूरियत के खेल में
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल--9871603621
जम्हूरियत के खेल में फँसती रही है ज़िंदगी
रोटी यहाँ महँगी हुई सस्ती रही है ज़िंदगी।
सच चाहते हो जानना तो खोल लो आँखों को तुम
बस वोट की खातिर ही तो बँटती रही है ज़िंदगी।
हालात कुछ ऐसे बने काली घटा हैरत में है
बरसात बिन ही बाढ़ में बहती रही है ज़िंदगी।
देखा कभी उनकी हँसी तो जाने क्यों ऐसा लगा
सिमटे लबों के बीच बस सिमटी रही है ज़िंदगी।
चुपचाप सहते ही रहे जुल़्म-ओ-सितम दुनिया के हम
सब कुछ लुटाकर इश्क में हँसती रही है ज़िंदगी।
बलिदानियों को याद करके दिल दुखाते क्यों 'अमर'
अब इंक़लाबी शोर में लुटती रही है ज़िंदगी।

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