टूटे परों परिंदे
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टूटे परों परिन्दे उड़ते वहाँ दिखे जब
सरहद के पार दुश्मन भी टूटने लगे तब
इक वाकया अज़ब सा दिल में बसा हुआ है
कटकर वहाँ धड़ों में चलते हुए मिले सब।
फूलों पे लग रहा था हर तीर का निशाना
बौछार तीर की हम कैसे भुला सकें अब।
भूला नहीं कहानी कौरव सभा की कोई
जब चीर हर रहे थे सबके सिले रहे लब।
करते शुरू नया जब कोई सितम अनूठा
पैग़ाम भेजते हैँ वो नित नये-नये तब।
बातेँ सभी करें अब दिन-रात दीन की ही
दीनो-धरम ‘अमर’ है मतलब अगर सधे जब।
------- अमर पंकज

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