जिन्दादिली से मिल हमेशा
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जिन्दादिली से मिल हमेशा आस अपनी छोड़ मत
गाता रहे तू नज़्म यूँ ही प्रेम बंधन तोड़ मत
कुछ तो कहेंगे दिलजले अक्सर ही तेरा नाम ले
दिखती नहीं गर रोशनी दिल तीरगी से जोड़ मत
शाम-ओ-सहर ख्वाबों में तू आ फिर लिपटकर दिल मिला
यारी तेरी गर खार से घट बेकली का फोड़ मत
बरसों बरस मैं भी उड़ा फ़िर आसमाँ से जब गिरा
थामा मुझे था गर्दिशों ने बेबसी को कोड़ मत
कुछ कह रही बहती नदी जो गीत गाती बढ़ रही
मत बाँध उसकी धार को उसकी दिशा को मोड़ मत
मशगूल सब खुद में यहाँ मसरूफ़ केवल एक तू
जो मुल्क के हालात हैं उनसे 'अमर' मुँह मोड़ मत
------ अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621

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