(ग़ज़ल)
कहना ग़ज़ल अब मेरी आदत बन गई
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कहना ग़ज़ल अब मेरी आदत बन गई
ये ज़िंदगी में ज़ख्म निस्बत बन गई
कुदरत ने जलवे कुछ दिखाए इस कदर
कुदरत की हर शै ही इबादत बन गई
लमहों में जीने का मज़ा अब आ रहा
लमहों की खुशियाँ मेरी किस्मत बन गई
पीते रहे ग़म, प्यास भी बढ़ती रही
उल्फ़त, पिए बिन ही हकीकत बन गई
कोई पिए तन्हा तो कोई बज्म में
आँखों से मय पीने की, आदत बन गई
मैंने पिए प्याले ग़मों के उम्र भर
अब अश्क़ पीना मेरी फ़ितरत बन गई
बेचैन तुम पीने की ख़्वाहिश में 'अमर'
हाथों में साग़र हो ये चाहत बन गई
------ डॉ अमर पंकज

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