गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

दोहे
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जब भी कुछ हो बोलना, बोलो अमृत घोल
नित्य करो धर्माचरण, मत पीटो तुम ढोल।
अद्भुत महिमा प्रेम की, जीवन का सच जान
मन मयूर नर्तन करे, शीतल हो दिनमान।
सुंदर जग में सब दिखे, जों सुंदर मन होय
सबपर बरसे नेह तो, बैरी ना हो कोय।
संगति उनकी कीजिए, जिनपर हो विश्वास
पल पल बदले रंग जो, उनसे क्या है आस।
मनमानी करता रहा, खुद को समझ महान
भेद खुला जब आज तो, रोए साँझ-विहान।
सिंहासन पर बैठता, चोरों का सरताज
बेशर्मी से लूटता, किए बिना कछु काज।
घड़ा पाप का भर चुका, देखो सब अब खेल
अब वह बच सकता नहीं, कर ले रेलमपेल।
दुर्जन ऐसे भौंकता, जैसे पागल श्वान
साधु करे है साधना, रखता सबका ध्यान।
पागल हाथी गाँव में, घुस तोड़े घर-बार
बेड़ी पड़ती पाँव में, तो होता लाचार।
मैला मन झूठी हँसी, खल की ये पहचान
बोली लिपटी चासनी, 'अमर' बात ये जान।

------ डॉ अमर पंकज 

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