सपने मत रंगीन दिखा (ग़ज़ल)

सपने मत रंगीन दिखा बस दिल में बसा तू अपनों को
मत दे जाने दूर उन्हें ले पास बुला तू अपनों को
अफ़सानों की बात न पूछो, कड़वे सच हैं जीवन के
मुश्किल तो है, पर अपना ले दर्द भुला तू अपनों को
माज़ी को कर याद नहीं जो बीत गयी सो बात गयी
बीते कल की ख़ातिर मत अब यार सता तू अपनों को
नर पशुओं की भूख बढ़ी, रक्त पिपासु बने आज सभी
हर पल फैले सुरसा का मुँह, आज बचा तू अपनों को
जीवन तो इक दरिया है बहते रहना इसकी फ़ितरत
सुख-दुख हैं दो छोर 'अमर' निज साथ बहा तू अपनों को

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन

ग़ज़ल बे-बहर (नज़्म ही मेरी आवाज़ है )