गीत फिर से दर्द के ही गा रही है ज़िंदगी (ग़ज़ल)




गीत फिर से दर्द के ही गा रही है ज़िंदगी,
बन अमावस रात काली छा रही है ज़िंदगी।
तू नहीं तो कह्र बन अब ढा रही है ज़िंदगी,
शख़्सियत थी क्या तेरी जतला रही है ज़िंदगी।
ज़िंदगी आसाँ नहीं कैसे जिएँ तेरे बिना,
रिक्तता का अर्थ अब समझा रही है ज़िंदगी।
दो क़दम का फ़ासला था भर न पाये हम जिसे,
सिसकियों की वज़्ह ये बतला रही है ज़िंदगी।
हर मुखोटा अब डराता रोज हमको इसलिए,
क़द्र करना ख़ून का सिखला रही है ज़िंदगी।
शह्र में आकर तो हम रोबोट बनकर रह गये,
फिर से सपने गाँव के दिखला रही है ज़िंदगी।
सुब्ह हो या शाम तुझको हर पहर ढूँढे 'अमर',
जा बसा तू दूर पर झुठला रही है ज़िंदगी।



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन

ग़ज़ल बे-बहर (नज़्म ही मेरी आवाज़ है )