रात भर मंजूर जालना (ग़ज़ल)

रात भर मंज़ूर जलना, जोत ने जतला दिया
दूर करके हर अँधेरा दीप ने दिखला दिया
घिर गया था हर तरफ़ से, रात काली थी बहुत
बिजलियों ने कौंधकर इक रास्ता बतला दिया
आग की बहती नदी को पार करना था कठिन
पार कर हमने उसे भी आपको दिखला दिया
बेअसर थी चीख मेरी कोई भी आया नहीं
ज़िंदगी ने चुप्पियों का तब हुनर सिखला दिया
बिन किए कोई ख़ता हर पल सज़ा मुझको मिली
आँसुओं ने इसलिये चुपचाप फिर नहला दिया
बेबसी का था कफ़स थीं धर्म की भी बेड़ियाँ
इसलिये तूने हँसी में सच 'अमर' झुठला दिया

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