जी के या मर के (ग़ज़ल)

जी के या मर के मगर पैदा कर
अब बगावत का जिगर पैदा कर
क्रांति की आग तो फैलेगी ही
इसके पहले तू शरर पैदा कर
गुम अँधेरों में न हो जाएँ हम
आस की कोई सहर पैदा कर
बंद आँखों से भी दिख जाऊँगा
प्यार की कोई नज़र पैदा कर
इश्क़ को मुश्क ही बनना लेकिन
आशिकी का तो हुनर पैदा कर
बात दिल में ही उतर जाएं बस
ऐसे जज़्बात 'अमर' पैदा कर

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