ज़िंदगी की शाम में (ग़ज़ल)

ज़िंदगी की शाम में इक़रार मैंने कर लिया है
कर लिया तो कर लिया है प्यार मैंने कर लिया है
उम्र भर का साथ है कोई बता दो हमसफ़र को
हारकर दिल प्रेम का व्यापार मैंने कर लिया है
सख़्त है जंजीर से भी प्यार की यह डोर समझो
बेड़ियाँ टूटें नहीं तय यार मैंने कर लिया है
भावना की बाढ़ तुझमें तू उफनती सी नदी हो
बाढ़ में बहकर नदी को पार मैंने कर लिया है
इस उलटबाँसी की धुन को भी 'अमर' समझा करो कुछ
किसलिये खुद से ही अब तक़रार मैंने कर लिया है

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