समझ तू खेल सत्ता का (ग़ज़ल)

समझ तू खेल सत्ता का मुक़द्दर बन के आया है
सियासी चाल है ये सब कलंदर बन के आया है
तुम्हें मालूम तो कुछ हो ज़माने भर के आँसू ही
जमा होकर तड़पता सा समंदर बन के आया है
हमेशा तुम रहे लड़ते शहादत भी है दी तुमने
मगर अब जीतकर दुश्मन सिकंदर बन के आया है
भिखारी सा बना फिरता था सत्ता की गली में जो
मिला अब साथ सत्ता का चुकंदर बन के आया है
हवा में उड़ रहे वादे चमत्कारी अदाएँ हैं
'अमर' पहचान तू उसको मछंदर बन के आया है
लाइक करें
कमेंट करें
शेयर करें

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन

ग़ज़ल बे-बहर (नज़्म ही मेरी आवाज़ है )