इक सुनामी नफ़रतों की (ग़ज़ल)

इक सुनामी नफ़रतों की फिर उठाते वो रहे
सब्र की क्या इंतिहाँ है आज़माते वो रहे
इस तरह खेला उन्होंने नफ़रतों का खेल है
तोड़कर दिल अब मुरीदों को रुलाते वो रहे
मुद्दतों चलता रहा था ये मुसलसल सिलसिला
राज़ जबसे खुल गया नज़रें झुकाते वो रहे
प्यार की ठंडी हवा ने फिर से सुलगा दी है आग
जल रहा था जो जिग़र उसको जलाते वो रहे
फूल की खुशबू 'अमर' अब फैलती कैसे कहो
उम्र भर काटों से ही आँगन सजाते वो रहे

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