ख़ौफ़ के साये में लगती अब है सस्ती ज़िंदगी

ख़ौफ़ के साये में लगती अब है सस्ती ज़िंदगी,
मौत से पहले हजारों बार मरती ज़िंदगी।

कुछ नहीं देता दिखाई सुन नहीं पाते हैं कुछ,
आग में जब भूख की हर पल झुलसती ज़िंदगी।

भूलकर अपनी अना सुल्तान का सज़दा करो,
जी हुज़ूरी का चलन है कहती रहती ज़िंदगी।

मौसमी बारिश का क्या चाहे बरसती ख़ूब हो,
बाढ़ लाती है यक़ीनन सिर्फ़ बहती ज़िंदगी।

मुल्क़ के इस दौर की है ये कहानी सुन ज़रा,
घोषणाओं के सहारे घटती बढ़ती ज़िंदगी।

टिमटिमाते से सितारे हैं बहुत इस बज़्म में,
किसलिए फिर चाँद की खातिर तरसती ज़िंदगी।

सीख लो दस्तूर इस बाज़ार का तुम भी 'अमर',
ओढ़ लो नकली हँसी होगी विहँसती जिंदगी।

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