भीड़ में शामिल कभी होता नहीं हूँ


भीड़ में शामिल कभी होता नहीं हूँ, 
बोझ नारों का कभी ढोता नहीं हूँ।

रात को मैं दिन कहूँ सच जानकर भी,
क्यों कहूँ मैं? पालतू तोता नहीं हूँ।

मुल्क़ की बर्बादियों को लिख रहा जो,  
मैं ही शाइर आज इकलौता नहीं हूँ।

झेलता हूँ हर सितम भी इसलिए मैं,
हूँ ग़ज़लगो धैर्य मैं खोता नहीं हूँ।

क्यों अचानक प्यार वह दिखला रहा है? 
हो न कोई हादसा, सोता नहीं हूँ।

हाथ मोती लग न पाया सच तो है यह,
मैं लगाता डूबकर गोता नहीं हूँ।

ये कमाई उम्र भर की है कि काँटे, 
मैं किसी की राह में बोता नहीं हूँ।

ज़ुल्म से डर कर 'अमर' पीछे हटूँ क्यों,
मौत को भी देखकर रोता नहीं हूँ।

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