कारवां लेकर चला था लोग अब थोड़े हुए


कारवां लेकर चला था लोग अब थोड़े हुए,
चल रहा हूँ मैं मगर हैं दोस्त मुँह मोड़े हुए।

सब यही कहते मिले है रास्ता सच का कठिन,
पर चला जब राह सच की दूर सब रोड़े हुए।

मान लूँ कैसे कि उनको है मुहब्बत ख़ुद से भी,
ख़ून से लथपथ है चहरा ख़ुद ही सर फोड़े हुए।

तुम दुखी थे मैं दुखी था इसलिये थे साथ हम,
दिल भरा तो साथ छूटा दुख ही था जोड़े हुए।

साथ की ख़्वाहिश नहीं अब दूर मैं हूँ जा चुका,
मुद्दतें बीतीं 'अमर' सब ख़्वाहिशें तोड़े हुए।

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