ग़ज़ल



छुपा राज़ जब बेलबादा हुआ है,
हुनर का खुलासा ज़ियादा हुआ है।

लुटाया है जब मैनें जो कुछ था मेरा,
मेरे दाम में इस्तिफ़ादा हुआ है।

मिटी याद सारी पुरानी मैं खुश हूँ,
सफ़ा डायरी का भी सादा हुआ है।

भटकता रहा जब यहाँ से वहाँ तक,
तो जाना तेरा दिल कुशादा हुआ है।

बचा खोने को है 'अमर' कुछ नहीं जब,
तो मज़बूत मेरा इरादा हुआ है।

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