ग़ज़ल



ख़ौफ में है शह्र सारा बेबसी फैली हुई है,
हम घरों में बंद हैं तो हर सड़क सूनी हुई है।

वक़्त बदला लोग बदले पर नही तक़दीर बदली,
दिन भयानक हो गए हैं रात हर सहमी हुई है।

भाग्य ने है छल किया क्या क्या किया मैं क्या बताऊँ,
लाश बनकर जी रहा हूँ ज़िंदगी ठहरी हुई है।

साथ सच का ही दिया सच को जिया है उम्र भर पर,
चुप हुआ मैं आज सबकी चेतना सोई हुई है।

ख़ून मैंने कर दिया है आज अपनी आत्मा का,
मूँद लो आँखे 'अमर' अब हर फ़ज़ा बदली हुई है।

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