कविता की व्याख्या अलग-अलग संदर्भों में और अलग-अलग दृष्टिकोणों से की जा सकती है, परंतु रचना प्रक्रिया और रचयिता की रचना-पूर्व मनःस्थिति की समझ सिर्फ किसी रचनाकार को ही हो सकती है। पाठक-समीक्षक-समालोचक भी स्रष्टा की सृष्टि की रस-धारा में अवगाहन करने वाले सहयात्री होने का अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करते हैं। यही कारण है कि किसी को कोई रचना पसंद आती है तो किसी दूसरे को वही रचना प्रभावित नहीं कर पाती है। लेकिन पसंद-नापसंद से परे, पाठकों की सहभागिता के बाद ही रचना-प्रक्रिया पूर्ण होती है। अतः कोई भी रचना सिर्फ स्वांतःसुखाय के लिए नहीं सृजित होती है। इसीलिए कवि या शायर अपनी कविता या शायरी विनम्रता से पाठकों / श्रोताओं के सम्मुख बार-बार परोसता है। कम से कम मैं तो इसीलिए ऐसा करता हूँ।
जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
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