नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...
चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है !
जवाब देंहटाएंउत्तम।
जवाब देंहटाएंnarayan narayan
जवाब देंहटाएंआपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है .आपका लेखन सदैव गतिमान रहे ...........मेरी हार्दिक शुभकामनाएं......
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
जवाब देंहटाएंब्लोगिंग जगत में स्वागत है
जवाब देंहटाएंशुभकामनाएं
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
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