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Migration of Maithil Brahmins in the region of Santal Pragnas and its surroundings

Anusandhanika / Vol. VIlI / No. II / July 2010 / pp. 184-189 ISSN 0974 - 200X -184- Migration of Maithil Brahmanas to Santal Parganas Amar Nath Jha Associate professor in History S. S. N. College University of Delhi, Delhi Abstract As far as the migration of Maithil Brahmanas in the area of our concern, Santal Parganas, is concerned we do not have any source to establish as when did they come to this area. During Pala period a large number of Brahmanas migrated to Bengal where, they received gifts of land and were offered high posts in the administration of the state. Similarly, the migration of Brahmanas also took place from Mithila in different directions. As far as the migration of the Maithil Brahman Panditas is concerned, we find that they migrated to Bengal in good numbers. The story of Adisura, a legendry king of Bengal is being credited for the migration of Maithil Panditas to Bengal. we can conclude that both D. C. Sircar and R. C. Majumdar are w...

वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हावी है.

आज कल देश में कई तरह की प्रवृतियाँ और विकृतियाँ एक साथ सक्रिय हैं. साहित्य, खेलकूद, संसद, सरकार, शिक्षा और धर्म--प्रत्येक मोर्चे पर कानफाडू चीख-पुकार मची हुयी है. सभी कोई देश सवारने में लगे होने का दावा कर रहे हैं, पर समाज बिखरता जा रहा है. क्यों? धर्म,जाति, के ठेकेदार जोर-जोर से अपनी बात कहकर खुद के जीतने का अहसास करा  रहे हैं, राजनीति के चतुर खिलाडी हमारी संवेदनाओं को कुचलते हुए देश को विकास के पथ पर ले जाने का आलाप कर रहे हैं, शिक्षक पूरे देश को क्रांति का पाठ पढ़ाने में लगे हुए हैं जबकि कॉलेज वीरान हो रहे हैं. साहित्यकारों की क्या बात करें? अपने-अपने मठों के महंत दूसरों  की बोटी-बोटी नोच लेने पर तुले हुए हैं. हम जो लिखें साहित्य; तुम लिखो तो कूड़ा--ये हिंदी जगत की शाश्वत घटिया राजनीति है और लेखक होने के कारण हम जन्मना महान हैं. क्या कहें, क्या न कहें? वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हावी है. क्या करें हम? क्या करो  तुम? क्या करें हम सब? कैसे करें हम सब?

वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हाबी है. .....see ...

आज कल देश में कई तरह की प्रवृतियाँ और विकृतियाँ एक साथ सक्रिय हैं. साहित्य, खेलकूद, संसद, सरकार, शिक्षा और धर्म--प्रत्येक मोर्चे पर कानफाडू चीख-पुकार मची हुयी है. सभी कोई देश सवारने में लगे होने का दावा कर रहे हैं, पर समाज बिखरता जा रहा है. क्यों? धर्म,जाति, के ठेकेदार जोर-जोर से अपनी बात कहकर जीतने का अहसास कर रहे हैं, राजनीति के चतुर खिलाडी हमारी संवेदनाओं को कुचलते हुए देश को विकास के पाठ पर ले जाने का आलाप कर रहे हैं, शिक्षक पूरे देश को क्रांति का पाठ पढ़ाने में लगे हुए हैं जबकि कॉलेज वीरान हो रहे हैं. साहित्यकारों की क्या बात करें? अपने अपने मठों के महंत दोसरों की बोटी बोटी नोच लेने पर तुले हुए हैं. हम जो लिखें साहित्य तुम लिखो तो कूड़ा--ये हिंदी जगत की शाश्वत घटिया राजनीति है और लेखक होने के कारण हम जन्मना महान हैं. क्या कहें, क्या न कहें? वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हाबी है. क्या करें हम? क्या काटो तुम? क्या करें हम सब? कैसे करें हम सब?

आचार्य पंकज के विराट व्यक्तित्व की प्रतिध्वनि: उद्‍गार - अमरनाथ झा

आचार्य पंकज के विराट व्यक्तित्व की प्रतिध्वनि: उद्‍गार आज 30 जून है. आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ का जन्मदिवस. अगर आज वे होते तो 91 साल के हो चुके होते. परंतु दीर्घायु होना उनके भाग्य में नहीं था. बल्कि समस्त हिंदी संसार का यह दुर्भाग्य था कि पंकज जी जैसे उद्‍भट्ट विद्वान और महत्वपूर्ण कवि मात्र 58 वर्ष की उम्र में अलविदा हो गये. इससे भी अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि अपने अनेकों कार्यों से इतिहास बनाने वाले इस चामत्कारिक व्यक्तित्त्व की साहित्यिक सेवाओं का हिंदी समाज में समुचित मूल्यांकन अभी तक नहीं किया है. पिछले बरस आज ही के दिन उनकी 90 वीं जयन्ति पर समस्त अंग प्रदेश के कृतज्ञ कवियों, लेखको और बुद्धिजीवियों ने उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके ऐतिहासिक अवदानों का पुण्य स्मरण किया था. पिछले बरस ही उनकी 32 वीं पुण्य तिथि पर यहां दिल्ली में भी जहां एक ओर डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने उनकी पचास बरस पुरानी हिमालय शीर्षक कविता को आज तक हिमालय पर लिखी गयी हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कविता घोषित की थी, वहीं मस्तराम कपूर ने उनकी उद्बोधन शीर्षक कविता को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि बताते ...

संताल परगना के विस्मृत मनीषी आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज" के अवदानों का मूल्यांकन ---

अमरनाथ झा असोसिएट प्रोफ़ेसर, इतिहास विभाग, स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय , दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली. सारांश आचार्य पंकज संताल परगना (झारखण्ड) में हिंदी साहित्य और हिंदी कविता की अलख जगाकर सैकड़ों साहित्यकार पैदा करने वाले उन विरले मनीषी व महान विद्वान-साहित्यकारों की उस परमपरा के अग्रणी रहे हैं जिनकी विरासत को यहां के लोगों ने आज तक संजोये रखा है. यूं तो संताल परगना की धरती पर पंकज जी के पहले और उनके बाद भी कई स्वनामधन्य साहित्यकारों ने अपना यत्किंचित योगदान दिया है, परंतु पंकज जी का योगदान इस मायने में सबसे अलग दिखता है कि उन्होंने साहित्य-सृजन को एक रचनात्मक आंदोलन में परिवर्तित किया. उन्होंने अपने गुरूजनों और पूर्ववर्ती विभूतियों से प्राप्त साहित्यिक संस्कारों की विरासत को न सिर्फ़ संजोया बल्कि उसे संताल परगना के नगर-नगर, गांव-गांव में फैलाकर एक नया इतिहास रचा. संताल परगना के प्राय: सभी परवर्ती लेखक, कवि एवं साहित्यकार बड़ी सहजता और कृतज्ञता के साथ पंकज जी के इस ऋण को स्वीकारते है. आचार्य पंकज ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में, हिन्दी विद्यापीठ देवघर के शिक्षक और श...

aha!aaj ka din kitana sunder hai,kyonki yah kitana naya hai

aha!aaj ka din kitana sunder hai,kyonki yah kitana naya hai---bhav jagat main.7 baje sokar utha ,naye din ka ahsas hua.naye varsh ka aabhaash hua, naye dashak kaa aagaaj hua.nit nootanataa.kshan-kshan men naveenataa.pal-pal ka jeevan.kaal ke anant pravah par pratyek pal tairaaa jeevan.hichkole ke thapedon ke beech adamya jeejeevisha ke sath chalata jeevan.samast brahmaand ko apane me sametakar chalataa jeevan.jeevan , jeevan sirf jeevn.ander jeevan bahar jeevan.jeevan leela ki mridul-katu smritiyon ke sath chalane vaala jeevan.nav varsh par navollas kaa jeevan.aao sab milkar is jeevan sudhaa kaa paan kare!poojya pitaji pankaj ji ke shabdon me----hai ek kabhi uthata parada , hai ek kabhi girata paradaa, uthane girane ka kram jaari, yoon khel manohar chalataa rahata. nav varsh me samasta brahmaand kee mangal kaamanaaon ke saath.