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फ़रवरी, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

HAPPY VALENTINE DAY

बड़ी मारा-मारी मची हुई है. कहीं प्यार--सेक्स का इज़हार हो रहा है तो कहीं प्यार पर बंदिश लगायी जा रही है. इस बीच मीडिया और दुनिया के अमीर लोग इस दिन के कांसेप्ट को बेच कर और अमीर बन रहे हैं. तो फिर मैं क्यों इस दिन की बधाई आपको दे रहा हूँ? किस पाले मैं हूँ मैं? जाहिर है लोग ऐसा ही कुछ जानना चाहेंगे. तो मैं बता दूँ की हमारा नारी-खंड प्रदेश जो आज का संताल परगना है, अपने आस-पास के प्रदेशों में जबरन अपनी भूमि को खो देने वाला, जबरन किसी और के साथ बंधने को मजबूर संताल परगना, महाभारत कल से ही प्रेम की उत्कटता का प्रतीक रहा है. पुरुष ही नहीं नारी भी दैहिक आकर्षण को मुखर स्वर दे सकती हैं इसका उदहारण रहा है यह प्रदेश--नारिखंड का प्रदेश. महाभारत के पन्नों को पलटिये और देखिये की किस तरह कुंती की देहिक प्रेमाकांक्षा यहाँ प्रज्वलित हो उठी थी. आज भी यहाँ के वन-प्रांतर में प्रेम या की --देह से आत्मा तक की यात्रा-- के कई सहज दृष्य हमको मिल जाते हैं. चाहे देह से आत्मा तक की यात्रा हो या मन से तन तक की तृप्ति--यहाँ की मिटटी सब कुछ देने में सक्षम है. तो फिर बवाल कहे का.और फिर चाहे -अनचाहे हम सब दुनिया की...

YAH NAYA AVTAR TO HAI HI, APANI PRACHIN ASMITA KI PAHCHAN HAI

अरे भाई चोंकिये नहीं, न ही वितृष्णा से मुह बिचकायिए. पंकज-गोष्ठी ब्लॉग विशुद्ध एतिहासिक एवं साहित्यिक संस्था को जीवित रखने का उपक्रम है, इसीलिए htt नमक  नवीन ब्लॉग की शुरुआत की है मेने, कृपया उसे जरूर विसित करें और मेरा मनोबल बढ़ाएं. हाँ इस ब्लॉग के नवीन अवतार के पीछे की तड़प को भी अगर आप पहचान पायें तो मेरा सपना सार्थक होगा. ज्यों-ज्यों में संताल परगना पर अपना शोध बाधा रहा हूँ, त्यों-त्यों मेरा विशष बढ़ता जा रहा है कि इस भूमि कि भयंकर उपेक्षा हुई है. ये तो महान सिदु-कान्हो-चाँद-भैरव का पुरुषार्थ था कि इस भूखंड को हल में, यही १५५ बरस पहले एक पहचान मिली है, वह भी विखंडित पहचान. मंदार  पर्वतराज, जो इस पवित्र भूमि का मुकुट रहा है, आज भी इससे अलग है. बाबा बैद्यनाथ इसके ह्रदय स्थल में ,  शक्ति के ह्रदय-स्थल में  भी, विद्यमान हैं यहाँ. पर शक्ति देवी माँ तारा के रूप में, जो इस भूमि कि शक्ति  रही हैं, वह आज भी बाहर रहने को विवश हैं. पूरा अरण्य-प्रदेश जो इस प्राचीन नारी-खंड कि पहचान है, आज भी इससे बाहर है, बांका के जंगल के रूप में. जमुई के  नरेश, ...

भाव भीनी श्रधांजलि देकर पंकज जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की.

१७-२१ जनवरी तक आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा 'पंकज' के पैत्रिक ग्राम--खैरबनी, पोस्ट--सारठ, जिला--देवघर, झारखण्ड में पंकज जी की स्मृति में पंच- दिवसीय चंडी-परायण यज्ञ का आयोजन हुआ. इस यज्ञ के मुख्य अतिथि थे झारखण्ड के कृषि-मंत्री श्री सत्यानन्द झा एवं प्रोफेसर सत्यधन मिश्र इस कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि थे. पंकज जी के तीसरे सुपुत्र एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय में असोसिएट प्रोफेसर अमर नाथ था के सान्निध्य में कार्यक्रम का आयोजन हुआ. कार्यं का सञ्चालन पंकज जी के दूसरे सुपुत्र और राजभासा विभाग, भारत सरकार में उप-निदेशक डॉक्टर विश्वनाथ झा ने किया और पंकज जी के बड़े सुपुत्र डॉक्टर नन्द किशोर झा, जो यज्ञ समिति के अध्यक्ष भी थे, ने कार्यक्रम क़ि अध्यखता की. कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मंत्री श्री सत्यानन्द झा ने भरी सभा में गौरव के साथ इस बात को रखा की आज वह जो कुछ भी हैं वह पंकज जी की कृपा से ही हैं. पंकज जी ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा था. निराशा के दिनों में वह यस सोचकर हिम्मत रखते थे की पंकज जी जैसे महान पुरुष का शिष्य होकर उन्हें कभी हिम्मत नहीं हराना...