रविवार, 6 सितंबर 2020

ग़ज़ल



छुपा राज़ जब बेलबादा हुआ है,
हुनर का खुलासा ज़ियादा हुआ है।

लुटाया है जब मैनें जो कुछ था मेरा,
मेरे दाम में इस्तिफ़ादा हुआ है।

मिटी याद सारी पुरानी मैं खुश हूँ,
सफ़ा डायरी का भी सादा हुआ है।

भटकता रहा जब यहाँ से वहाँ तक,
तो जाना तेरा दिल कुशादा हुआ है।

बचा खोने को है 'अमर' कुछ नहीं जब,
तो मज़बूत मेरा इरादा हुआ है।

ग़ज़ल



ख़ौफ में है शह्र सारा बेबसी फैली हुई है,
हम घरों में बंद हैं तो हर सड़क सूनी हुई है।

वक़्त बदला लोग बदले पर नही तक़दीर बदली,
दिन भयानक हो गए हैं रात हर सहमी हुई है।

भाग्य ने है छल किया क्या क्या किया मैं क्या बताऊँ,
लाश बनकर जी रहा हूँ ज़िंदगी ठहरी हुई है।

साथ सच का ही दिया सच को जिया है उम्र भर पर,
चुप हुआ मैं आज सबकी चेतना सोई हुई है।

ख़ून मैंने कर दिया है आज अपनी आत्मा का,
मूँद लो आँखे 'अमर' अब हर फ़ज़ा बदली हुई है।

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

ग़ज़ल

गजल:
अमर पंकज
(डाॅ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल--987160362

कड़ा पहरा है मुझपर तो सँभलकर देखता हूँ मैं,
बदन की क़ैद से बाहर निकलकर देखता हूँ मैं।

कभी गिरना कभी उठना यही है दास्ताँ मेरी,
बचा क्या पास है मेरे ये चलकर देखता हूँ मैं।

जिधर देखो उधर है आग छूतीं आसमाँ लपटें,
चलो इस अग्निपथ पर भी टहलकर देखता हूँ मैं।

बहुत है दूर मुझसे चांद पर छूने की ख़्वाहिश है,
उसे छूने को बच्चों सा मचलकर देखता हूँ मैं।

नहीं उलझन सुलझती है कठिन हैं प्रश्न जीवन के,
पहेली से बने जीवन को हल कर देखता हूँ मैं।

ग़मों के बोझ से बोझिल हुईं गमगीन पलकें जब,
तेरी आँखों से बनकर अश्क ढलकर देखता हूँ मैं।

न बदला है न बदलेगा 'अमर' दस्तूर दुनिया का,
मगर तेरे लिये ख़ुद को बदलकर देखता हूँ मैं।

ग़ज़ल



अगर मैं तेरे शह्र आया न होता,
तो दिल को भी पत्थर बनाया न होता।

उजड़ती नहीं ज़िंदगी हादसों से,
अगर होश अपना गँवाया न होता।

सँपोले के काटे तड़पता नहीं मैं,
अगर दूध उसको पिलाया न होता।

बयाँ तजर्बा अपना करता मैं कैसे
अगर ज़िंदगी ने सिखाया न होता।

कभी कह न पाता ग़ज़ल इस तरह मैं,
अगर जख़्म मैंने भी खाया न होता।

अँधेरों में भी रोशनी आती छनकर,
अगर चाँद ने मुँह छुपाया न होता।

तेरी याद में मुस्कुराता वो कैसे,
अगर तू 'अमर' उसको भाया न होता।

ग़ज़ल


ग़ज़लः

क्या है अच्छा और क्या अच्छा नहीं कैसे कहें,
है यहाँ पर कोई भी सच्चा नहीं कैसे कहें।

हम ग़ज़ल हिन्दी में कहते चढ़ सके जो हर जुबां,
अब दिलों में घर बने इच्छा नहीं कैसे कहें।

दोस्त समझा और हमने भी भरोसा कर लिया,
दोस्ती में भी मिला गच्चा नहीं कैसे कहें।

तेज़ सी आवाज़ है और तल्ख़ से अल्फाज़ भी,
उनको अच्छी ही मिली शिक्षा नहीं कैसे कहें।

दाद दी हर शेर पर उसने हमें दिल भी दिया,
वह अभी मासूम सा बच्चा नहीं कैसे कहें।

क्यों गुज़ारिश पर गुज़ारिश आपसे अब भी करें,
आपने जो भी दिया भिक्षा नहीं कैसे कहें।

दो क़दम आगे बढ़ा पीछे हटा तू सौ क़दम,
प्यार में तू है 'अमर' कच्चा नहीं कैसे कहें।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

क्या है अच्छा और क्या अच्छा नहीं कैसे कहें


क्या है अच्छा और क्या अच्छा नहीं कैसे कहें,
है यहाँ पर कोई भी सच्चा नहीं कैसे कहें।

हम ग़ज़ल हिन्दी में कहते चढ़ सके जो हर जुबां,
अब दिलों में घर बने इच्छा नहीं कैसे कहें।

दोस्त समझा और हमने भी भरोसा कर लिया,
दोस्ती में भी मिला गच्चा नहीं कैसे कहें।

तेज़ सी आवाज़ है और तल्ख़ से अल्फाज़ भी,
उनको अच्छी ही मिली शिक्षा नहीं कैसे कहें।

दाद दी हर शेर पर उसने हमें दिल भी दिया,
वह अभी मासूम सा बच्चा नहीं कैसे कहें।

क्यों गुज़ारिश पर गुज़ारिश आपसे अब भी करें,
आपने जो भी दिया भिक्षा नहीं कैसे कहें।

दो क़दम आगे बढ़ा पीछे हटा तू सौ क़दम,
प्यार में तू है 'अमर' कच्चा नहीं कैसे कहें।

कारवां लेकर चला था लोग अब थोड़े हुए


कारवां लेकर चला था लोग अब थोड़े हुए,
चल रहा हूँ मैं मगर हैं दोस्त मुँह मोड़े हुए।

सब यही कहते मिले है रास्ता सच का कठिन,
पर चला जब राह सच की दूर सब रोड़े हुए।

मान लूँ कैसे कि उनको है मुहब्बत ख़ुद से भी,
ख़ून से लथपथ है चहरा ख़ुद ही सर फोड़े हुए।

तुम दुखी थे मैं दुखी था इसलिये थे साथ हम,
दिल भरा तो साथ छूटा दुख ही था जोड़े हुए।

साथ की ख़्वाहिश नहीं अब दूर मैं हूँ जा चुका,
मुद्दतें बीतीं 'अमर' सब ख़्वाहिशें तोड़े हुए।

भीड़ में शामिल कभी होता नहीं हूँ


भीड़ में शामिल कभी होता नहीं हूँ, 
बोझ नारों का कभी ढोता नहीं हूँ।

रात को मैं दिन कहूँ सच जानकर भी,
क्यों कहूँ मैं? पालतू तोता नहीं हूँ।

मुल्क़ की बर्बादियों को लिख रहा जो,  
मैं ही शाइर आज इकलौता नहीं हूँ।

झेलता हूँ हर सितम भी इसलिए मैं,
हूँ ग़ज़लगो धैर्य मैं खोता नहीं हूँ।

क्यों अचानक प्यार वह दिखला रहा है? 
हो न कोई हादसा, सोता नहीं हूँ।

हाथ मोती लग न पाया सच तो है यह,
मैं लगाता डूबकर गोता नहीं हूँ।

ये कमाई उम्र भर की है कि काँटे, 
मैं किसी की राह में बोता नहीं हूँ।

ज़ुल्म से डर कर 'अमर' पीछे हटूँ क्यों,
मौत को भी देखकर रोता नहीं हूँ।

सपना दिन में देखा, टूटा



सपना दिन में देखा, टूटा,
रहबर ने ही सबको लूटा।

कैसे कहें अफ़रा तफ़री में,
किसने किसको कितना कूटा।

अक्सर करता बात बड़ी जो,  
होता है वह कद का बूटा।

दुनिया दारी समझी मैंने,
साथ तुम्हारा जबसे छूटा।

आज 'अमर' तुम बदले से हो,
पिघला पत्थर, झरना फूटा।

कुछ मस्तियाँ कुछ तल्ख़ियतयाँ जाने-ज़िगर ये इश्क़ है

ग़ज़ल:
अमर पंकज
(डाॅ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621

कुछ मस्तियाँ कुछ तल्ख़ियाँ जाने-जिगर ये इश्क़ है,
कुछ फ़ासले कुछ दर्मियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है।

परवाह साहिल की करें क्यों आज जब फिर लह्र से, 
टकरा रहीं हैं कश्तियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है।

है आग पानी में लगी फ़ैली ख़बर जब हर तरफ़,
बनने लगीं हैं सुर्खियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है।

नज़दीकियाँ जबसे बढीं हैं दोस्ती के नाम पर, 
दिल में चलीं हैं बर्छियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है।

है ये जुनूँ की आग मत दो तुम हवा, इस आग में 
जलकर मिटीं हैं हस्तियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है।

करने चला था फ़तह दिल शमशीर लेकर शाह जब
उजड़ीं कईं थीं बस्तियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है।

मंदिर 'अमर' यह प्रेम का है भीड़ भक्तों की यहाँ,
सबने लगायी अर्ज़ियाँ जाने ज़िगर ये इश्क़ है।

मौत भी हो सामने तो मुस्कुराना चाहिए

ग़ज़ल:
अमर पंकज
(डाॅ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621

मौत भी हो सामने तो मुस्कुराना चाहिए,
हाँ, नहीं क़ातिल के आगे सर झुकाना चाहिए।

प्यार के बाज़ार में किस भाव से दिल बिक रहा,
प्यार की क़ीमत चुकाकर आज़माना चाहिए।

फूल-काँटे हर डगर तुमको मिलेंगे सच यही,
चूमकर कांटों को आगे बढ़ते जाना चाहिए।

सिर्फ़ बातों से नहीं है भूख मिटती पेट की,
काम जो करता नहीं वापिस बुलाना चाहिए।

कुछ उसे आए न आए उसने सीखा ये हुनर,
महफ़िलों में आगे बढ़ चहरा दिखाना चाहिए।

आजकल के दौर का कैसा चलन तू ही बता, 
दोस्ती को क्या अदद सीढ़ी बनाना चाहिए।

जिस दिशा जाना तुम्हें उसकी 'अमर' पहचानकर,
पथ सही पहचानकर ही पग बढ़ाना चाहिए।

ख़ौफ़ के साये में लगती अब है सस्ती ज़िंदगी

ख़ौफ़ के साये में लगती अब है सस्ती ज़िंदगी,
मौत से पहले हजारों बार मरती ज़िंदगी।

कुछ नहीं देता दिखाई सुन नहीं पाते हैं कुछ,
आग में जब भूख की हर पल झुलसती ज़िंदगी।

भूलकर अपनी अना सुल्तान का सज़दा करो,
जी हुज़ूरी का चलन है कहती रहती ज़िंदगी।

मौसमी बारिश का क्या चाहे बरसती ख़ूब हो,
बाढ़ लाती है यक़ीनन सिर्फ़ बहती ज़िंदगी।

मुल्क़ के इस दौर की है ये कहानी सुन ज़रा,
घोषणाओं के सहारे घटती बढ़ती ज़िंदगी।

टिमटिमाते से सितारे हैं बहुत इस बज़्म में,
किसलिए फिर चाँद की खातिर तरसती ज़िंदगी।

सीख लो दस्तूर इस बाज़ार का तुम भी 'अमर',
ओढ़ लो नकली हँसी होगी विहँसती जिंदगी।

शनिवार, 11 जुलाई 2020

आँधियो में ज़ोर कितना (ग़ज़ल)

ग़ज़ल:
अमर पंकज
(डाॅ अमर नाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621

आँधियों में ज़ोर कितना आज़माते हम रहे
ज़िन्दगी तेरे तराने रोज़ गाते हम रहे

फूल की मुस्कान कल थी आज पत्थर भाग्य में
प्यार से पिघला दो पत्थर यह सिखाते हम रहे

झूठ ही युगधर्म है कैसे कहो हम मान लें
सांकरी सच की गली चलकर दिखाते हम रहे

दिन पुराने याद करके खंडहर ग़मगीन था
कैसे करता ग़म गलत उसको रुलाते हम रहे

हाथ की उलझी लकीरों पर करें विश्वास क्यों
जब कभी उजड़ा चमन तो गुल खिलाते हम रहे

छा रहा था फिर नशा या गुफ़्तगू का था असर
सुर्ख़ से गुस्ताख़ लब थे दिल लगाते हम रहे

क्यों नहीं उनपर भरोसा हम 'अमर' फिर से करें
मिल तसव्वुर में उन्हीं से खिलखिलाते हम रहे

सोमवार, 6 जुलाई 2020

शुक्रिया तेरा वतन (ग़ज़ल)


शुक्रिया तेरा वतन हम हक़ अदा करते रहे
सरहदों की हो सुरक्षा इसलिये मरते रहे

है पता बदलेंगी इक दिन मुल्क़ की रानाइयाँ
पर भयानक देख मंज़र आज हम डरते रहे

पाल रक्खा था सँपोला काट खाया जिसने है
जानलेवा ज़ह्र हर-पल अश्क़ बन  झरते रहे

पूछ बैठें हम न ग़ुरबत या जहालत का सबब
इसलिये वो धर्म में उलझा दिया करते रहे

क्या कहीं से फिर चुनावी है हवा बहने लगी?
रैलियाँ इस लाॅकडाउन में भी वो करते रहे

कब बहेगा धमनियों में गर्म ख़ूँ फिर से 'अमर'
छोड़कर लड़ना लड़ाई आह क्यों भरते रहे

रविवार, 5 जुलाई 2020

आपसे मिलने की ख़ातिर (ग़ज़ल)



आपसे मिलने की ख़ातिर आह हम भरते रहे
क्या हुआ जो ख़्वाब में ही प्यार हम करते रहे

क्या कहेंगे क्या सुनेंगे सोचना मुश्किल हुआ
उलझनों में हम उलझकर रोज ही मरते रहे

सुहबतों ने आपकी हमको  सिखाई है वफ़ा
हम वफ़ा के नाम पर ख़ुद पे सितम करते रहे

बादलों की ओट से चमकीं कभी जब बिजलियाँ
डर पुराना याद कर अंज़ाम से डरते रहे

इश्क़ में हम आपके जबसे हुए पागल हैं जी
ज़ह्र का हर घूंट भी हँस कर पिया करते रहे

जब ये जाना राह उनकी और मेरी  है ज़ुदा
नैन से मोती निरंतर बूँद बन झरते रहे

आपकी बदमाशियों ने गुदगुदाया दिल 'अमर'
छुप-छुपाके प्यार यूँ ही आपसे करते रहे

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

अनमोल हैं आँसू न जाया करो (ग़ज़ल)


अनमोल हैं आँसू न जाया करो
बेवजह भी तुम मुस्कुराया करो

मुश्किल है जीना तुम्हारे बिना
मेरे ख्वाबों ख्यालों में आया करो

प्याले गमों के हैं छलकने लगे
मत धैर्य मेरा आज़माया करो

प्यासा बहुत हूँ प्यार का जाम अब
हर रोज आकर तुम पिलाया करो

जो रूठते हैं प्यार में बार बार
पलकों पे उनको ही बिठाया करो

माना कि मुश्किल है डगर प्यार की
हिम्मत दिखाकर पास आया करो

हर हाल देता साथ है जो 'अमर'
तुम भी उसी पर दिल लुटाया करो

तू क्यों छुपाता है मियाँ (ग़ज़ल)


तू क्यों छुपाता है मियाँ
जो हैं तेरी मज़बूरियाँ

ये तो नशा है वस्ल का
कहतीं खनकतीं चूड़ियाँ

आँसू गिरे तब भी नहीं
चुभती रहीं जब बर्छियाँ

अब दूर से ही दिल मिला
रखनी अभी हैं दूरियाँ

फ़ितरत यही कुर्सी की है
सबको लड़ातीं कुर्सियाँ

आवाज़ देतीं सरहदें
आओ पहन लें वर्दियाँ

होगा बदलना अब 'अमर'
दो छोड़ बनना सुर्खियाँ

रविवार, 28 जून 2020

फिर घिरी है शाम वैसी (ग़ज़ल)


फिर घिरी है शाम वैसी और डेरा फिर वही
रोशनी के बीच भी फैला अँधेरा फिर वही

शोर ये शमशान में है चल रही है लाश, पर
दफ़्न हूँ मैं कब्र में मेरा बसेरा फिर वही

रात अँधियारी बहुत है सब्र कब तक हम करें
दिल हुआ बेचैन क्या होगा सवेरा फिर वही

धुन पुरानी ही बजेगी खेल होगा साँप का
साँप है बाजू में उसके है सँपेरा फिर वही

नाचतीं अटखेलियाँ करतीं हैं जब भी मछलियाँ
जाल में उनको फँसाता तब मछेरा फिर वही

हट गया है चीन अब इस बात का चर्चा बहुत
पर दिखाया सैटलाइट ने है घेरा फिर वही

धान, गेहूँ, साग-सब्ज़ी मुल्क़ में भरपूर है
पर 'अमर' क्यों हाल अब भी तेरा मेरा फिर वही

शनिवार, 27 जून 2020

मैं भी हो आया बुक फेयर (कविता)

मैं भी हो आया बुक-फेयर
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अमर पंकज
(डॉ अमर नाथ झा )
दिल्ली विश्वविद्यालय
मोबाइल-9871603621

कई सालों बाद
इस साल मैं भी
हो आया
बुक-फेयर
मेट्रो से उतरकर
मेट्रो स्टेशन में ही
टिकट लेने का चला चक्कर
टिकट लेकर
काफी धूमकर
भूल-भूलैया से रास्ते
तेढ़ी-मेढ़ी
उबड़-खाबड़
थी वह डगर
कम से कम
एक किलोमीटर
पैदल चलकर
पहुँच गया मैं
बुक-फेयर
लेकर घर आ गया
बहुत सारी किताबें खरीदकर।
मैं भी हो आया बुक फेयर।

रास्ते में
मूँगफली बेचने वाले
पावभाजी सैंडविच पापड़
आलू के पराठे खिलाने वाले
और न जाने क्या-क्या
दिखाने वाले
विक्षुब्ध विश्वामित्र द्वारा
बनाई गई अजूबी दुनिया के
अजूबे वासिंदे की तरह
आज भी
एक अलग दुनिया में
त्रिशंकु बने हुए
मजबूर होकर टंगे हुए
कई लोगों का
लगा हुआ था
बुक फेयर के बाहर
एक और फेयर
मैं भी हो आया बुक फेयर।
बाहर के इस फेयर में
मिल रहीं थी किताबें भी
मंहगी-मंहगी किताबें
सस्ते में मिल रहीं थी
बेचने वाले भी
सस्ते लग रहे थे
कपड़े मैले जो पहन रखे थे।
मैं भी उधर से गुजर रहा था
अपना भद्रवर्गीय चरित्र ओढ़े
नाक-भौं सिकोड़े
मेरे ओढ़े हुए
भद्रवर्गीय चरित्र को
बुक-फेयर पहुँचने की जल्दी थी
इसलिए
नही खरीदी मैंने
उनसे कोई किताब
आगे बढ़ गया मैं भी
एक सरसरी नजर देखकर
अजूबी दुनिया से बचकर
स्वयं को
भद्रलोक का अंग मानकर
मैं भी हो आया बुक-फेयर।
वैसे वहाँ थी
हर तरह की किताब
हर उम्र की किताब
हर क्लास की किताब।
गालिब की किताब
गुलजार की किताब
अमृता पीतम की किताब
हैरी पोर्टर की किताब।
हिन्दी उर्दू पंजाबी
और अँग्रेजी की किताब।
तीस रुपए में एक
पचास रुपए में दो
और सौ रुपए में तो
मिल रही थी
पाँच-पाँच किताब।
सभी लड़के
आवाज लगाते
मोल भाव करने पर
रीबेट देने की बात कहते
तरह-तरह से लुभाते
ललचाई आँखों से
आने जाने वाले लोगों को
संभावित गाहक मानते
चिकनी-चुपड़ी बातों से
बिक जाएँ किताबें
पूरी कोशिश करते
दिनभर लगे रहते
चलाते रहते
कोई ना कोई चक्कर।
मैं भी हो आया बुकफेयर
आखिरी दिन था
जानता था मेला बड़ा है
संभव कहाँ था जाना
एक-एक हाल
इसीलिए
तसल्ली से धूमा
कुछ चुनिंदा हाल
देखा कुछ स्टाॅल
और इस तरह
पूरी कर ली
रस्म अदायगी
कुछ किताबें खरीदकर
मान लिया
किताबों की दुनिया में
मैंने भी खरीद लिए
अपने हिस्से के शेयर
मैं भी हो आया बुक-फेयर।
खुद को भी पढ़ाकू बताने के लिए
अपनी मौजूदगी जताने के लिए
खर्च करने पड़े कुछ पैसे
मुश्किल से बचते हैं जो
महीना गुजरने के बाद
रोजमर्रा की जरूरतें
पूरी होने के बाद
मकान-गाड़ी की किस्त
चुकाने के बाद
बीबी की फेहरिस्त
आधी-अधूरी
पूरी करने के बाद।
अपनी ओढ़ी हुई चादर
हमेशा सफेद बनी रहे
इसके लिए ही
देता रहा हूँ
हर किस्म की किस्त
उम्र-भर
जीता रहा हूँ मैं
किस्त दर किस्त
देख लीजिए
जिंदगी ही बन गई है
एक मुकम्मल किस्त।
किस्तों में जिंदगी बिताकार
अधूरी ख्वाहिशों
अतृप्त कामनाओं
और सुरसा सी बन चुकी
एक से बढ़ाकर एक
उलझनों के बीच
रास्ता निकालकर
लेकिन चलता रहा
यूँ जीवन भर
मैं भी हो आया बुक-फेयर।
किताबें खरीदकर
अपने लेखक-कवि होने का
प्रमाण-पत्र बटोरने
या फिर कवियों में
शुमार होने का जुगाड़ भिड़ाने
मैं जाकर बैठ गया
लेखक मंच की दुकान में
एक खाली पड़ी कुर्सी खींचकर।
इस मंच की छोटी सी बैठक में
बड़ी-बड़ी बातें हो रहीं थीं
मुझे भी बहुत कुछ जानने का
मौका मिल गया
आज के लेखकों की
मिमियाती आवाज और उन्मत्त बोल सुनकर।
मैं भी हो आया बुक-फेयर।
देखा मैंने वहीं
कुछ आधुनिकाओं और वागवीर वीरांगनाओं को
लग रहीं थी
निपट आकेली
लेकिन बन रहीं थीं
नारी-स्वातंत्रय की
स्वघोषित झंडाबरदार
विदाउट मैन रहने की
लगाती गुहार।
टेलीविजन पर पूरी तरह मेकअप में
अक्सर सुनाई देती हैं
कई आवाजें तेज-तर्रार।
यहाँ भी मंच के आस-पास
हवा में तैर रहीं थीं
वैसी ही स्वर-लहरियाँ
लगातार
कटीली-गंधहीन मुस्कान भी
बिखर रहीं थी
चारों-तरफ बार-बार।
महिला-विमर्श के
धुरंधरों को भी
देखा मैंने
एक हाथ में क्लच
दूसरे हाथ में मोबाइल
और कंधे से झोला लटकाए
घूमते हुए
लेखक मंच के आस-पास
स्त्री-पुरूष में भेद किए बिना
बड़े आलोचकों की ओर
एकटक रहीं थी निहार
बार-बार।
अकेले होने का
ले रही थी
भरपूर आनंद
सशक्तिकरण के दौर में
झोला ढोने का आनंद
अपना भार उठाने का आनंद।
आनंद का सफर
बदस्तूर जारी था
लेकिन
सशक्तिकरण का सफर
थोड़ा भारी था
इस बार
उन्हीं पर थीं सबकी नजर
उनकी थी कहीं और नजर
मैं भी हो आया बुक-फेयर।
मेला खत्म होने को था
सात बज चुके थे
इसलिए मैं भी
खरीदी गई किताबें समेटकर
लेखक-मंच के पास ही
खो गए मेट्रो-कार्ड को
बार-बार यादकर
कोस रहा था खुद को।
कोसना वाजिब था दोस्तो
एक सौ दस रुपए बचे हुये थे
पचास रुपए की धरोहर राशि अलग
यानी कुल
एक सौ साठ पुए थे मेट्रो कार्ड में
और आमदनी अठन्नी
खर्चा रुपया एक की तर्ज पर
सौ साठ रुपए का चूना लगाकर
बार-बार खुद को कोसकर
निकाल आया मैं
हाल के बाहर
एक बार फिर उसी दुनिया में
जहाँ व्यवस्था द्वारा
त्रिशंकु बना दिये गए लोगों का
अब भी लगा हुआ था हुजूम।
इस बार इस दुनिया में
आ गए थे और कुछ किरदार
अब यह दुनिया भी
लगने लड़ी थी असरदार
नकली गहनों के
मोल-भाव में मशगूल
उम्र दराज नहीं
मेरी ही हमउम्र
खाए-अघाए घरों की
भरी-पूरी हसीनाएँ
सुंदरियाँ कहिए हुजूर
चहक-चहक कर
तफरीह कर रहीं थीं
खूब खिल रहीं थीं
सारी थकान उनकी
यहीं धुल रही थी।
अपने बच्चों के साथ
हसीनाएँ पूरी तर
पिकनिक मना रहीं थीं
पतिदेव द्वारा दी गई छूट का
भरपूर लुत्फ ले रही थीं।
पतिदेव भी मुग्ध थे
अपनी प्राण-पियारी की
अटखेलियों पर
खूब प्रेम बरसा रहे रहे
नन्हें-मुन्ने बच्चों पर
इधर-उधर दौड़ते बच्चों को
थामे रहने के लिए
भागे जा रहे थे
कभी इधर तो कभी उधर।
गदगद थे पतिदेव भी
गर्वोन्नत सीना और
मस्तक ऊँचा किए
सस्मित आनन लिए
अचानक मिल गई
पत्नी की सहेलियों पर
प्रेम की कोमल पंखुड़ी
बिखेरते हुए
वे आ रहे थे
बेहद खुश-नजर
हो भी क्यों नहीं
शुरू हो चुका था
पति-पत्नी दोनों का
अलग-अलग पर
मजेदार ये सफर
मैं भी हो आया बुकफेयर।
महोदय
मैंने भी देखा लिया
एक ही दिन में
कई-कई फेयर
कर लिया मैंने
एक साथ
कई दुनिया का सफर
मैं भी हो आया बुक फेयर।

सफ़र अभी बाकी है (कविता)

सफ़र बाकी है अभी
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अमर पंकज
(डा अमरनाथ झा)
दिल्ली विश्वविद्यालय

सफर बाकी है अभी
अभी बाकी है
जिंदगी से अभिसार
कह रहा हूं
तुम्हीं से
बार-बार
सुन रही हो न
ऐ मृत्यु के आगार।
अभी तो अक्षुण्ण है
जीवन-ऊष्मा का
अनंत पारावार।

सुनो तुम
जीवन की
चुनौती भरी ललकार
हमेशा भारी पड़ेगा
तुम्हारे
क्रूर-दानवी अट्टहास पर
हमारा
मधुरिम-संसार।

साक्षी का
कत्थक-नृत्य
सोनू का
छाया-चित्र
मेरी कविता की
तान
और
प्रिय की मुस्कान
नित दे रहे हमें
अक्षत-जीवन का
शाश्वत वरदान।

मेरे गाँव को तो
देखा है तुमने
वहाँ देखा होगा
हर पल
जीवन के स्पन्दन को
तुम्हारे क्रूर-प्रहार
निरन्तर सहकर भी
बेसुध हो
नर्तन करता
'चिरहास-अश्रुमय'
मधुमय
जीवन का संसार।

नीमगाछ-छाँव तले
निश्चिन्त लेटकर
बतियाते
बेसिर-पैर की बातें करते
गाँव से लेकर अमेरिका की
राजनीति की
नब्ज टटोलते
ब्राह्मणत्व के दर्प से गर्वित
स्वयं को
दुनिया का सबसे बुद्धिमान
विचारवान-संस्कारवान
चरित्रवान प्राणी जतलाते
दुर्लभ स्वाभिमान की थाती
फोकट में संजोते
एक ही धोती
सुखाते-पहनते
जनेऊ छूकर
नित्य अपनी
अखंड पवित्रता की
कसमें
खाते नहीं अघाते
हंस-हंस कर
उम्र भर
दारिद्र्य की जिन्दगी
शान से गुजारते
अद्भुत
मानव समूह को।

बतालाओ आज
सच-सच
क्या तुमने
झांककर कभी देखा है
उम्र-दराज आँखों में
रचे-बसे
मोद-मय जीवन की
हरित कामनाओं को ?

देखा होगा तुमने
जामुन की सुगन्ध पर
गुंजार करती
भौंरों की टोलियां
पककर जमीन पर
गिर गई निबोरियों से
रस चूस-चूस
मधुमय
अमृत बनाती
मघुमक्खियों की
शोखियाँ
आग बरसाती लू में
तपती हवा की
किए बिना परवाह
कभी धूप
कभी छाँव में
लहराती-बलखाती
इठलाती-मंडराती
इन्द्रधनुषी छटा
यहाँ-वहाँ बिखेरती
रंग-बिरंगी
तितलियाँ।

जरूर देखा होगा
भरी दुपहरी में
घरवालों की आखों में
नित धूल झोंककर
घरों से भागकर
पत्थर मार गिराते
नमक-मिर्च लगाकर
खट्टे आम खाकर
जिन्दगी का जश्न मनाते
जीवन के ही गीत गाते
रोज तुझे चिढ़ाते
मस्ती में डूबे
नटखट-शरारती
उपद्रवी बच्चों की
भटक रही टोलियाँ।

पहला घर
गाँव का
हमारा ही तो है
अहाते के दरवाजे पर
ठीक बांई तरफ
आज भी खड़ा है
विशाल
फलदार-छायादार
आम का पेड़।
नुनुका का दावा था
उन्होने ही रोपा था
अपनी जवानी में इसे
इसीलिए तो
जब भी हम चढ़ते थे
अपने इस पेड़ पर
गूँजने लगती थी
उस छत से आती
दहाड़ती आवाज !
जब तक वो आते
अपनी जवानी की
साधना पर
लम्बा-लच्छेदार
भाषण सुनाते
हम सब
नौ-दो-ग्यारह हो जाते।

भरी दुपहरी में
रेतीली पगडंडियों पर
हरदम भगने वाले
आम-इमली की खुशबू से
बौरा जाने वाले
बार-बार तोड़कर
नमक-मिर्च सानकर
चटकारे ले-लेकर
हरे छिलके समेत
खट्टे-कच्चे आम खाकर
आत्मा की गहराईयों तक
तृप्त होने वाले
उन्मादी-जीवन की
अदम्य जीजीविषा को
कौन तोड़ सकता है?
बोलो-बोलो
बोलो तुम
क्या तुम ?
हर्गिज नहीं !

माँ कहा करती थी
नरियरवा आमगाछ तले
नुनु (दादा जी) का जनम हुआ
केरवा आमगाछ भी
घर के कोला में था
वहीं रहते थे
बाप-दादों के पुरखे।
नरियरवा आमगाछ
नहीं रहा
केरवा आमगाछ भी
बूढ़ा हो गया
तो क्या हुआ ?
स्मृतियों की थाती
अभी तक जवान है
स्मृतियाँ
जीवन का रोशनदान है
पुरखों का अवदान है।

माँ-बुढी(दादी) चली गईं
बाद में नुनु गए
असमय ही बाबूका भी
हम सभी को छोड़ गए
बिलखती हुई माँ
विधवा होकर
हो गई अनाथ !
लेकिन नहीं
हम नहीं हुए अनाथ !
माँ ने फटकार दिया
दुर्दिन को
किशोर उम्र में ही
बाबूदा ने
ललकार दिया
दुर्दिन को
और
दे दिया सबको
अपने लौह व्यक्तित्व का
अभेद्य कवच।

सब पलते गए
निरन्तर बढ़ते गए
दुखों को मिल-बाँट
साथ-साथ झेलते गए
दुर्गम जीवन-पथ की
भयंकर आपदाओं से
आँख-मिचौली खेलते गए
असहज जिन्दगी
सरलता से जीते गए।

पता तो है तुम्हें भी
आस-पास ही जो
खड़ी रहा करती थी
छिप-छिप कर
सब कुछ
देख लिया करती थी
हां, तब जीवन
था कठिन
मगर हम डटे रहे
जीने की जिद पर
अहर्निश अड़े रहे।
रोते-हँसते
लड़ते-झगड़ते
ताल ठोंक-ठोंक
तुमको ललकारते
जीवन-रस पीते रहे ।

माँ चली गई
रह गई कुर्बानियाँ
उनकी कही
अनकही कहानियाँ।
आमगाछ की
ताजी रोमाँचित करती
स्मृतियाँ जीवन्त हैं
वैसे ही जैसे
जीवन का हर रस
मुग्ध हो पीने की
पोर-पोर जीने की
तमन्ना
अथाह-अनन्त है।

बार-बार गीत मेरे
करते मनुहार हैं  !
आज तुम नाद सुनो
जीवन संगीत का
अभी बाकी है
संवाद अविरल पारावार से
मंझधार से उस पार से
 ऐ देवि
सुन रही हो न
ताल लय
मधुमास का विश्वास का आभास का
फैला है जो चारों ओर
समेटे सब कुछ
सब कुछ।
Dr. Amar Pankaj
Delhi University

पितृ-मिलन (कविता)


पितृ-मिलन
--------------
बाबू दा
तुम्हारे निमित्त
धर्म-शास्त्र सम्मत
समस्त कर्मकांड
गाँव में ही पूर्ण कर
अब
सब दुमका आ गये।
दुमका आकर
खूब खोजा तुम्हें
भाभी के साथ मिलकर
उस मसनद को टटोला
जिसे पीठ के पीछे
टिकाया था तुमने
आखिरी वक़्त
कि शायद तुम्हारा
नया पता-ठिकाना
मिल जाए!
बहुत देर तक खोजा
बल्कि खोजता ही रहा
ठीक उसी तरह
जैसे
पिछले चौबीस वर्षों से
खोज रहा हूँ
छत पर चढ़ने के लिये
बनी सीढ़ियों पर
माँ को।
देर तक बैठा रहा मैं
तुम्हारी कुर्सी पर
जिस पर
बैठे बैठे तुम
अपने पौत्र 'स्नेह' के साथ
खेलते रहते थे
'एसी' नहीं चलाने पर
'स्नेह' झगड़ता था तुमसे
और हार कर
तुम चला देते थे 'एसी'
हार कर भी
जीत जाते थे तुम।
लेकिन 'स्नेह' ने
झगड़ा नहीं किया मुझसे
शायद वह जानता है कि
तुम्हारी कुर्सी पर बैठने से ही
कोई तुम सा नहीं हो जाएगा
तुम्हारा रिक्त स्थान
कभी भरा नहीं जाएगा।

बाबू दा
तुम चले गये
कहाँ चले गये?
जाना नहीं था
जाना चाहते भी नहीं थे
फिर भी तुम चले गये?
जाना पड़ा तुमको
काल के प्रवाह में
ठीक उसी तरह
जिस तरह
तेंतालीस साल पहले
बाबू का गये थे
डाक्टर नहीं आ सका था तब!
डाक्टर नहीं आ सका अब!
तब साधन नहीं था
कि गाँव से
महज दो किलोमीटर दूर
जल्दी से सारठ पहुँचकर
कोई बुलाता डाक्टर
और
बचा लेता बाबू का को
नुनूका और छोटबाबू
पैदल ही निकल पड़े
डाक्टर को बुलाने
डाक्टर आये भी
लेकिन देर हो चुकी थी!
क्या बदला
इन तेंतालीस वर्षों में?
सब कुछ
दुहराया गया
गाँव की तरह ही
यहाँ इस दुमका शहर में भी
इस दुमका शहर में,
जो उप-राजधानी है
कोई डाक्टर नहीं आ सका
किसी डाक्टर के पास
नहीं ले जा सके तुमको
करोना के
भयाक्रांत वातावरण में
लाकडाऊन की कैद से
बाहर निकलकर
कोई डाक्टर नहीं आया
तेजी से गिर रहे
तुम्हारे रक्तचाप को
स्थिर करने के लिये
तुम्हें बचाने के लिये
कोई नहीं आया!
जीने की तुम्हारी इच्छा
तुम्हारे साथ ही चली गयी
तुम्हें बचा नहीं सका कोई
और
लाकडाऊन ने
ले ली तुम्हारी जान
हाँ लाकडाऊन ने ही
ले ली तुम्हारी जान!

बाबू दा
तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारी रिक्तता से उत्पन्न
शून्यता के अथाह सागर में
डूब रहे हैं हम सब
दिखता नहीं
कोई रास्ता
कैसे सँभालें सामाजिक-कौटुम्बिक
ताने बाने को
तुम्हारे बिना।
कौन अब
अपनी उपस्थिति की धमस से
हर सम्त केन्द्रीय व्यक्तित्व बनकर
ध्रुव तारे की तरह
चमकता रहेगा
प्रत्येक सामाजिक-पारिवारिक
समारोह में
कौन अब
शादी-व्याह, यज्ञोपवीत, मुंडन
नामकरण संस्कार के अवसर पर
कालीपूजा-चेताली पूजा
डोरा-सूरजाहू पूजा
सरस्वती पूजा-शीतला पूजा
दशमी-शिवरात्रि
के अवसर पर
तड़क-भड़क और चकाचौंध
पैदा करके
अपने आभामंडल में
दमकता रहेगा।
कोई भी समारोह
अब समारोह नहीं होगा।

बाबू दा
तुम्हारी छवि
बुतरू दा में
तलाश रहे हैं हम
लेकिन उनकी व्यथा
देखी नहीं जाती
आदत जो पड़ गयी थी बुतरू दा को
रोज-रोज फोन पर
तुमसे बात करने की
तुम्हारी ख़बर लेकर
हम सबको बताने की
तुम्हें याद करके
तुम्हारे साथ हुई बातें याद करके
कभी सुबक-सुबक कर
तो कभी फफक-फफक कर
रोते हैं बुतरू दा
अंदर ही अंदर घुल रहे हैं
रो रहे हैं अंदर ही अंदर
लेकिन कर्मयोगी की तरह
सारे लौकिक कर्म भी
करते जाते हैं
'कुणाल' का कवच
और हम सबकी ढाल बनकर!

बाबू दा
कितना अखरा हमें
तुम्हारे ही एकादशा श्राद्ध के दिन
तुम्हारा अभाव
खाने के लिये
सिर्फ़ हम दो भाई बैठे
पहली बार
और हमारी आँखे
ढूंढ रहीं थीं
तुमको ही बार-बार!
याद है न तुम्हें
हमेशा हम तीन भाई
एक साथ निकलते थे
एक साथ बैठते थे
एक साथ खाना खाते थे
तुम्हारे टेबल पर खाना खाते समय
तुम्हारी कुर्सी पर बैठे हुए
लग रहा था
मानो आखिरी बार
समेट रहा हूँ
तुम्हारी छुवन का एहसास
लेकिन अब?
रिक्तता
शून्यता
बस तुम्हारी यादें।

बाबू दा
तुम बीमार थे
पर मिलने न आ सके हम
दिल्ली की दुनिया में
अस्त-व्यस्त
या
मस्त (?)
मर-मर कर
जीने को अभ्यस्त
हम
तुमसे मिलने न आ सके!
हम आये
लाकडाऊन को तोड़कर
तूफ़ान से लड़कर
भयानक बारिश और
आँधी-तूफ़ान का सामना कर
दिल्ली से लखनऊ
फिर लखनऊ से गया
फिर गया से गाँव
नक्सली इलाकों में
मीलों गाड़ी चलाकर
जान को हथेली में लेकर
हम आ ही गये गाँव
पहुँच ही गये गाँव
बुतरू दा भी
करोना-लाकडाऊन को
धता बताकर
मुम्बई छोड़कर
पहुँच गये गाँव
घर पहुँच गये सबलोग
पर तुम नहीं मिले!
हम आ गये उस घर में
माँ के जाने के बाद जहाँ
तुम्हारे बिना
रहना नहीं सीखा था
तुम्हारे बिना किसी को
घर पर बुलाना नहीं सीखा था
अब वहीं बैठकर
आँगन के बाहर
खलिहान में
कुटुंबियों-परिजनों के संग
तुम्हारे श्राद्ध के लिये
विमर्श कर रहे थे हम
निमंत्रित किये जाने वाले
मेहमानों की
सूची बना रहे थे हम।
जिन कौटुम्बिक नियमों को
जीवन भर नहीं जाना
जिन रीति रिवाजों को
जीवन भर नहीं माना
उन्हें सीख-समझ रहे थे हम
या कहें
कुछ भी न समझते हुए
सब कुछ समझने की
प्रतीति करा रहे थे।

बाबू दा
अंतिम विदाई में
शामिल न हो सके हम
तीसरे दिन
फूल चुनने के लिये भी
पहुँच नहीं सके हम
"...शमशाने च यः तिष्ठति सः बांधव:"
कहाँ साथ दे सके शमशान तक हम
कैसे बंधु हैं हम
चौथे दिन पहुँचे घर
तुम्हारी चहेती बेटी कुमकुम के साथ
तुम्हारे बड़े दामाद को लेकर
क्योंकि
प्रयागराज में
गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम स्थल पर
अस्थि विसर्जन का कार्य
नाती, भीगना और दामाद को ही संपन्न करना था
संगम के प्रवाह संग
तुम्हें महासागर में मिलना था
इस लोक से परलोक गमन था
व्यष्टि से समष्टि बननकर
भौतिक सत्ता को तिरोहित कर
बह्मांड के केन्द्र में पहुँचकर
मोक्ष प्राप्त करना था
इसीलिये तो
कुमकुम के साथ
बड़े दामाद को लेकर
हर हाल हमें पहुँचना था।
और सातवें दिन
दामाद बाला बाबू
भगीना कौशल और नाती हर्ष के साथ
भोर साढ़े चार बजे निकल पढ़े प्रयागराज
लेकर तुम्हारे अस्थि-अवशेष
पुल पर बैठा
देखता रहा मैं
अनंत की ओर तुम्हारी यात्रा!

बाबू दा
धरी की धरी रह गयी
तुम्हारे साथ बेफिक्र होकर
जीने की तमन्ना।
बाबू दा
बहुत गिला-शिकवा है तुमसे
बचपन से आजतक
खुलकर बात नहीं कर पाया
लेकिन सोचता रहा
एक ही साथ एक ही बार
बता दूँगा अपने मन की बात
लेकिन कुछ भी बता न सका
काफ़ी देर कर दी हमने
कहने की व्याकुलता
धरी की धरी रह गयी।
पेट भर बात करने की इच्छा
मन में ही मर गयी।
हजारों बेडियों में जकड़े
हजारों घाव लिये
हजारों बार
अपमान के घूँटपीकर
जीने को विवश
अपने अंतर्मन की व्यथा
दिखला नहीं पाया
कभी तुमको
इस डर से
कि कहीं कुछ हो न जाए तुम्हें!
भूला नहीं हूँ
तेंतालीस बरस पहले का दृश्य
जब गाँव के आँगन में
तुम्हारी-हमारी आखों के सामने
आधी रात अचानक
हम सबों को छोड़कर
बाबू का चले गये थे
और तुमने
बाबू का की जगह लेकर
अपनी छत्रछाया में
हमें निर्विघ्न आगे बढ़ने हेतु
हम दो किशोर अनुजों के
पिता बनने हेतु
उत्तरीय छूकर
कसम खायी थी
हमारे लिये तुम
बाबू का बन गये थे!
और हम भी तुमको
कभी खोना नहीं चाहते थे
बाबू का की तरह
इसलिए कुछ भी नहीं बताते थे
तुम्हें हम!
तुम तो समझ रहे होगे न
कि बहुुत कुछ बताने की चाह होते हुए भी
क्यों नहीं बताया तुम्हें कुछ भी
कभी भी
क्यों हमेशा चुप रहा?
तुम जानते थे न
कि खोना नहीं चाहते हम
कभी तुमको!
लगता था
जब तुम निश्चिन्त हो जाओगे
चिंता मुक्त हो जाओगे
तो खुलकर दिखाऊँगा तुम्हें
क्षत-विक्षत
अपने मन-प्राण
और पूछूँगा
कि क्यों इतनी कठिन तपस्या
मेरे ही हिस्से में आयी
क्यों बचपन से लेकर
प्रौढ़ावस्था तक
खुलकर नहीं हँसा मैं
क्यों क्रूर नियति ने
पहले से बड़ा आघात
हर बार दिया मुझको
क्यों?
क्यों?
क्यों मैं अपने से बात करता रहा
खुद से ही लड़ता रहा
अपने-आप में खोया रहा!
क्यों तुमने पूरी होने न दी
मेरी यह साध?
सुना नहीं क्यों तुमने
मेरा मौन आर्तनाद?
पढ़ी नहीं तुमने क्यों
मेरी चुप्पी की आवाज़?
छोड़ दिया सबको
छोड़ दिया हमको
पहुँचा दिया वहीं
जहाँ तेंतालीस साल पहले थे हम सब
बाबू का के जाने के बाद!

बाबू दा
एक तरफ़ तुम्हारे नहीं रहने का शोक था
तो दूसरी तरफ़
तुम्हारे मोक्ष के निमित्त
शास्त्रीय कर्म संपन्न करने की लगन और तन्मयता
भरी-भरी आँखे
परंतु मंत्रोच्चार करती जिह्वा
मुद्राओं के भाव करते
एकादश श्राद्ध के दिन
पुरोहित और महाब्राह्मण का आशीर्वाद ही
मोक्ष-मार्ग का अवलंबन
बछिया की पूँछ
वैतरणी पार कराने नाव
गौ माता की पूजा
परलोक-गमन-पथ
निर्विघ्न करने का साधन
महाब्राह्मण को गौमाता का दान
वृषोत्सर्ग श्राद्ध कर्म
सर्वोत्तम श्राद्ध कर्म
वृष की दोनों जंघाओं पर
चक्र और त्रिशूल के निशान
समस्त शास्त्र विहित कर्म
संपन्न करने के बाद
महाब्राह्मण दम्पति की पूजा
भाट-ब्राह्मण द्वारा
मृदंग की थाप
कीर्तन दल द्वारा
हरिनाम भजन
देवघर के
तीर्थ पुरोहितों
वैदिक पंडितों द्वारा
सस्वर वेद-मंत्रोच्चार की ध्वनि
और
'मधुपर्क' का महाप्रसाद
ग्रहण करते महाब्राह्मण
सब के सब बता रहे थे
कि तुम चले गये बाबू दा!
पर दिल है
कि मानता ही नहीं
कि सारे कर्मकांड
इस बात की गवाही है
कि तुम चले गये!

बाबू दा
तुम सचमुच चले गये
पिता-पितामह-प्रपितामह के पास
ज्योतीन्द्र देव, वसंत देव
प्राणधन देव के पास
बाबू का, नुनू
और प्राणधन ठाकुर के पास!
इन्हीं निर्दयी आँखों ने देखा
पितृ-मिलन का वह
हृदय विदारक दृश्य
जब पुरोहित
पिण्ड से पिण्ड मिला रहे थे
तुम्हें पितृलोकवासी बना रहे थे
और अपने पुत्र
'कुणाल' के हाथों
'पिण्डदान' पाकर तुम
परलोक वासी
'पितर' बन रहे थे
पिण्ड' से 'पिण्ड' मिल रहे थे
पितृ मिलन हो रहा था
और तुम हो रहे थे मुक्त
सांसारिक बंधनों से!
सब कुछ खुला खुला सा था
सब कुछ धरा धरा सा था
पुरोहित बार-बार सुना रहे थे
"पुत्रार्थे क्रियते भार्या
पुत्र: पिण्ड प्रयोजनम्"

अमर पंकज
9871603621

जी के या मर के (ग़ज़ल)

जी के या मर के मगर पैदा कर
अब बगावत का जिगर पैदा कर
क्रांति की आग तो फैलेगी ही
इसके पहले तू शरर पैदा कर
गुम अँधेरों में न हो जाएँ हम
आस की कोई सहर पैदा कर
बंद आँखों से भी दिख जाऊँगा
प्यार की कोई नज़र पैदा कर
इश्क़ को मुश्क ही बनना लेकिन
आशिकी का तो हुनर पैदा कर
बात दिल में ही उतर जाएं बस
ऐसे जज़्बात 'अमर' पैदा कर

बहकने की भी सीमा है (ग़ज़ल)

बहकने की भी सीमा है, भटकना छोड़ दे प्यारे
ठहर, आ पास अपनों के मिलेंगे सुख सभी न्यारे
अमल करता नहीं कोई बड़े-बूढ़ों की बातों पर
नयी दुनिया की उलझन में घिरे अब जा रहे सारे
सियासत की हिरासत में यहाँ तकदीर है जकड़ी
विवश होकर सभी उनकी लगाते मुफ़्त जयकारे
जरा धीरज रखो तुम भी समय पर सुब़्ह भी होगी
अँधेरी रात से देखो लड़े जाते सभी तारे
'अमर' मजबूर लोगों पर तरस आता रहा हमको
सुनें तो अम्न की बातें लुटें पर रोज बेचारे

कोई नहीं मंज़िल मेरी (ग़ज़ल)

कोई नहीं मंज़िल मेरी फिर क्यों चला मैं जा रहा
मैं जा रहा हूँ किस दिशा मुझको नहीं कुछ है पता
कैसे नहीं होता परेशाँ क्यों न मैं होता दुखी
अंधा बना कानून जब पापी को है लेता बचा
अपराध करके छूटते हैं रोज अपराधी यहाँ
दे सच बता कानून देता पाप की तू क्या सजा
जाती जहाँ तक भी नज़र फैला हुआ है बस धुआँ
हर सिम्त फैला ज़ह्र है मैं ज़ह्र लूँ कैसे पचा
अवतार अब लेते नहीं भगवान भारत देश में
उत्पात करते दानवों को कौन रोकेगा भला
अब दिल धड़कना बंद है, अब व्यर्थ सांसे चल रहीं
अस्मत लुटी मेरी मग़र कुछ भी नहीं मैं कर सका
कितना विवश था मैं 'अमर' बस चीख ही सुनता रहा
कुछ भी नहीं मैं कर सका तो क्यों जियूँ कोई बता

क्या कहें किसको कहें (ग़ज़ल)

क्या कहें किसको कहें सौगात दी जो ज़िंदगी ने
दानवी इस दौर में चुप कर दिया है बेबसी ने
एक ही अपराध मेरा, सच को सच कहता रहा मैं
कौन देता साथ सच का, मुझसे दूरी की सभी ने
क्रांति थी आराधना, मैं था मनुजता का पुजारी
भेद की दीवार तोड़ी, साल के हर दिन महीने
जाति-मज़हब कुछ नहीं बस प्रेम था जीवन हमारा
पर उजाड़ा प्रेम का संसार नफ़रत की नदी ने
ॠषि विरासत धमनियों में भूल बैठा क्यों 'अमर' तू
त्याग तेरा देख रक्खा युग युगों से हर सदी ने

सपने मत रंगीन दिखा (ग़ज़ल)

सपने मत रंगीन दिखा बस दिल में बसा तू अपनों को
मत दे जाने दूर उन्हें ले पास बुला तू अपनों को
अफ़सानों की बात न पूछो, कड़वे सच हैं जीवन के
मुश्किल तो है, पर अपना ले दर्द भुला तू अपनों को
माज़ी को कर याद नहीं जो बीत गयी सो बात गयी
बीते कल की ख़ातिर मत अब यार सता तू अपनों को
नर पशुओं की भूख बढ़ी, रक्त पिपासु बने आज सभी
हर पल फैले सुरसा का मुँह, आज बचा तू अपनों को
जीवन तो इक दरिया है बहते रहना इसकी फ़ितरत
सुख-दुख हैं दो छोर 'अमर' निज साथ बहा तू अपनों को