संदेश

सितंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये है साझी विरासत अपनी

   ये है साझी विरासत अपनी ................................. अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय ये है साझी विरासत अपनी फिक्र में जिस्म हम गलाते रहे वो हँसते रहे बेफिक्र क्या हुआ जो आपको हम रूलाते रहे। कोई दिल के करीब था न था क्या बताऐँ ये राज तुमको मगर शिद्दत से मिलकर उसको यूँ हर बार हम बचाते रहे। जमीं से आसमां तलक थी फतह की गूँज कुछ ऐसी फैली गर्दो-गुबार की फिर चली आँधी चश्मे-तर हम छिपाते रहे। है आसां नहीं तेरे भी लिए जज्ब करना वो मजबूर सी हँसी सबको है पता अस्मत खुद की ही रोज-रोज हम लुटाते रहे। हर बार छलकता ही रहा जो सब्र का पैमाना ऐ नूरे-हयात पूछिए दिल से कि क्यों हर हाल आपको ही हम मनाते रहे। मुर्दों को सुकूँ वहाँ भी ना था जमीं-आसमां मिले थे जहाँ बेखौफ "अमर" खूँ के छींटे तेरे निजाम में सब उड़ाते रहे।

एक इंच धरती स्वदेश की हम न छोड़ने वाले हैं

एक इंच धरती स्वदेश की हम न छोड़ने वाले हैं .................................................................. (प्रो ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज) एक इंच धरती स्वदेश की हम न छोड़ने वाले हैं । आग उगलती तोपों से हम मुँह न मोड़ने वाले हैं ।। हम हैं वीर भरत के वंशज, हम में प्रताप का पानी है। कोटि चवालिश एक-एक हम शेर शिवा अभिमानी हैं ।। कुँवर सिंह की अमिट निशानी आज हमें ललकार रही है । मर्दानी झाँसी की रानी कब से हमें पुकार रही है।। वृद्ध हिमालय क्रुद्द कण्ठ से बार-बार हुँकार रहा है । क्षुब्ध सिंधु बन काल भुजंगम शत-शत फन फुत्कार रहा है ।। आज शांति के अग्रदूत का सौम्य वदन अंगार हुआ है । भारत का बच्चा-बच्चा तक आज शत्रु हित काल हुआ है ।। सावधान अविवेकी, तेरी नीति न चलने वाली है । राम-कृष्ण की भू पर तेरी दाल न गलने वाली है ।। 'हिमालय बोल रहा है' (काव्य संकलन,1963) से साभार। संग्राहक -- एस डब्लू सिन्हा (तत्कालीन जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी, दुमका)। प्रकाशक -- जिला जनसम्पर्क विभाग, दुमका।

कातिल तेरी अदाएँ

कातिल तेरी अदाएँ .......................... अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय कातिल तेरी अदाएँ शातिर तिरा मुस्कुराना पहलू में छिपा खंजर दिल से दिल मिलाना। मिजाज कुछ शहर का कुछ असर तुम्हारा खुशी मिली मुझे भी के मौजूं मेरा फसाना। फितरत तेरी समझकर सभी हँस रहे अब मिलकर तेरा हमीं से यूँ हाले-दिल सुनाना। सबको खबर हुई मुश्किल में आज तुम भी फिर करीब आने का खोजते नया बहाना। कदमों में बिछ गए पड़ी जब तुम्हें जरूरत मेरा जो वक्त बदला रकीबों के पास जाना। खुदा की ईनायत 'अमर' ईमान तेरा गवाह जख्म भरे तो नहीं पर गैरों को मत रुलाना।

इक ठहरी हुई सर्द शाम

इक ठहरी हुई सर्द शाम ............................. अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय इस गुलाबी शहर की थी वो इक ठहरी हुई सर्द शाम दिल की पाती से जुड़ा था शबनम सा तेरा नाम। थम सा गया था वक्त यारो ये रुत भी मुस्कुराने लगी खनककर चूडियाँ दे रहीं थीं प्यार का पैगाम। अधमुंदी पलकों की होगी अलसाई भोर से मुलाकात जज्बाती खयालों ने कस ली अश्कों की लगाम। जिन्दगी ले चुकी थी करवटें पर पतंगा मिटता ही रहा इश्क में ता-उम्र शम्मा धू-धू जलती रही गुमनाम। कैसे निकाले बूँद मकरंद की बिखरे हुए परागों से कोई मोहब्बत फसाना बन धुआँ होती रही सरे आम। मिटा न सकी गर्द गुजरे जमाने की 'अमर' बहकती यादें लटकते गजरों को महकती साँसों का ये सलाम।

अनर्गल प्रलाप

अनर्गल प्रलाप ..................................... नेता बनने के लिए नौटंकी करना सीखो अभिनय जितना अच्छा कर लोगे नेता उतना ही ऊँचा बन लोगे वृथा ना होने जाए ये कथन है यही आज का ब्रह्मज्ञान। नौटंकी अगर कर सकते नहीं तो तुम नेता भी बन सकते नहीं। देश के हर मर्ज का इलाज मात्र थोथा आश्वासन है भ्रष्टाचार का कबाड़ बेचने वाला कबाड़ी संसद-विधान सभाओं में लत-घूंसे का करतब दिखने वाला खिलाड़ी सच-झूठ के घालमेल में प्रवीण यूनियनों पर कब्जा करने वाला जुगाड़ी आज के समाज का पुरौधा है वह बहुत बड़ा अभिनेता है वही हमारा-आपका चहेता नेता है। छात्र-आंदोलनों और जनांदोलनों पर सवार होकर अपनी राजनीति चमकने के लिए क्रांति का मसीहा खुद को कहलवाने के लिए बीच अधर में ही आंदोलनों की लुटिया डुबोकर मक्कारी से आंदोलनों को सिद्धि-प्रसिद्धि का राजपथ बनाने के लिए दारू की बोतल सुंघाकर उन्मादी चीत्कार करने वाले परमवीर चाटुकारों-दलालों की फौज से लोगों का सबसे बड़ा हमदर्द घोषित करवाने के लिए जो अहर्निश चौकन्ना रहता है तिकड़म भिड़ाने की जुगाड़बाजी करता है वह बैठे-बिठाए नेता बन जाता है । मत भूलना झूठ-मूठ ही सही जोर-जोर से र...

जिंदगी के क्या कहिए

जिन्दगी के क्या कहिए ................................. अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) टुकड़ों में बँटती रोज लुटती हुई जिन्दगी के क्या कहिए सच को सौदा बना रहे हैं जहाँ ऐसे डेरों के क्या कहिए। शिद्दत से तो पूछे कोई उनसे हुई इस शोहरत का राज मचल उठे हैं दिल बहके से इस अंदाज के क्या कहिए। हैरान थे सब देखकर काफिले की शानो-शौकत का रंग मुंसिफ ने जों सुनाया हुक्म उसकी रंगत के क्या कहिए। खुदा से कमतर क्यों समझे जों पास हो दरिन्दों की फौज मासूमों पे कहर बरपाते शैतानों की नीयत के क्या कहिए। फरिश्ता कहते हो उसको जो करता इन्सानियत का खून धरम की धज्जियाँ उड़ाते हैं उन हुक्मरानों के क्या कहिए। बिरहमन को गालियां इस रस्मी-रिवाज से क्या होगा 'अमर' सजदा करें चौखट पे हाकिम हालाते-मुल्क के क्या कहिए।

धरम का धंधा है फिर ऊफान पर

धरम का धंधा है फिर ऊफान पर ........................................... अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) धरम का धंधा है फिर ऊफान पर खूब बिकते देखा है शुक्रिया भक्तो राक्षसों को भी भगवान बनते देखा है। वक्त का फैसला भला कौन टाल सका आज तलक पुजारियों की औलाद को भी दरबान बनते देखा है। प्यार की बगिया भी क्यों अब मैदाने-जंग बनने लगी फूलों को अपने आँगन में ही धू-धूकर जलते देखा है। इंकलाब की कश्ती पर चढ़के जो हुक्मरान बन गए सरे आम उनको जातियों का सरदार बनते देखा है। शोर ही सफलता का आज है पैमाना बन गया मगर अंगार बन दहकते थे जो उनको धुआँ बनते देखा है। अँधेरों को चीरकर जो जहां रौशन करते रहे 'अमर' सच के लिए उनको मीरा वो सुकरात बनते देखा है।