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आँधियो में ज़ोर कितना (ग़ज़ल)

ग़ज़ल: अमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 आँधियों में ज़ोर कितना आज़माते हम रहे ज़िन्दगी तेरे तराने रोज़ गाते हम रहे फूल की मुस्कान कल थी आज पत्थर भाग्य में प्यार से पिघला दो पत्थर यह सिखाते हम रहे झूठ ही युगधर्म है कैसे कहो हम मान लें सांकरी सच की गली चलकर दिखाते हम रहे दिन पुराने याद करके खंडहर ग़मगीन था कैसे करता ग़म गलत उसको रुलाते हम रहे हाथ की उलझी लकीरों पर करें विश्वास क्यों जब कभी उजड़ा चमन तो गुल खिलाते हम रहे छा रहा था फिर नशा या गुफ़्तगू का था असर सुर्ख़ से गुस्ताख़ लब थे दिल लगाते हम रहे क्यों नहीं उनपर भरोसा हम 'अमर' फिर से करें मिल तसव्वुर में उन्हीं से खिलखिलाते हम रहे

शुक्रिया तेरा वतन (ग़ज़ल)

शुक्रिया तेरा वतन हम हक़ अदा करते रहे सरहदों की हो सुरक्षा इसलिये मरते रहे है पता बदलेंगी इक दिन मुल्क़ की रानाइयाँ पर भयानक देख मंज़र आज हम डरते रहे पाल रक्खा था सँपोला काट खाया जिसने है जानलेवा ज़ह्र हर-पल अश्क़ बन  झरते रहे पूछ बैठें हम न ग़ुरबत या जहालत का सबब इसलिये वो धर्म में उलझा दिया करते रहे क्या कहीं से फिर चुनावी है हवा बहने लगी? रैलियाँ इस लाॅकडाउन में भी वो करते रहे कब बहेगा धमनियों में गर्म ख़ूँ फिर से 'अमर' छोड़कर लड़ना लड़ाई आह क्यों भरते रहे

आपसे मिलने की ख़ातिर (ग़ज़ल)

आपसे मिलने की ख़ातिर आह हम भरते रहे क्या हुआ जो ख़्वाब में ही प्यार हम करते रहे क्या कहेंगे क्या सुनेंगे सोचना मुश्किल हुआ उलझनों में हम उलझकर रोज ही मरते रहे सुहबतों ने आपकी हमको  सिखाई है वफ़ा हम वफ़ा के नाम पर ख़ुद पे सितम करते रहे बादलों की ओट से चमकीं कभी जब बिजलियाँ डर पुराना याद कर अंज़ाम से डरते रहे इश्क़ में हम आपके जबसे हुए पागल हैं जी ज़ह्र का हर घूंट भी हँस कर पिया करते रहे जब ये जाना राह उनकी और मेरी  है ज़ुदा नैन से मोती निरंतर बूँद बन झरते रहे आपकी बदमाशियों ने गुदगुदाया दिल 'अमर' छुप-छुपाके प्यार यूँ ही आपसे करते रहे

अनमोल हैं आँसू न जाया करो (ग़ज़ल)

अनमोल हैं आँसू न जाया करो बेवजह भी तुम मुस्कुराया करो मुश्किल है जीना तुम्हारे बिना मेरे ख्वाबों ख्यालों में आया करो प्याले गमों के हैं छलकने लगे मत धैर्य मेरा आज़माया करो प्यासा बहुत हूँ प्यार का जाम अब हर रोज आकर तुम पिलाया करो जो रूठते हैं प्यार में बार बार पलकों पे उनको ही बिठाया करो माना कि मुश्किल है डगर प्यार की हिम्मत दिखाकर पास आया करो हर हाल देता साथ है जो 'अमर' तुम भी उसी पर दिल लुटाया करो

तू क्यों छुपाता है मियाँ (ग़ज़ल)

तू क्यों छुपाता है मियाँ जो हैं तेरी मज़बूरियाँ ये तो नशा है वस्ल का कहतीं खनकतीं चूड़ियाँ आँसू गिरे तब भी नहीं चुभती रहीं जब बर्छियाँ अब दूर से ही दिल मिला रखनी अभी हैं दूरियाँ फ़ितरत यही कुर्सी की है सबको लड़ातीं कुर्सियाँ आवाज़ देतीं सरहदें आओ पहन लें वर्दियाँ होगा बदलना अब 'अमर' दो छोड़ बनना सुर्खियाँ

फिर घिरी है शाम वैसी (ग़ज़ल)

फिर घिरी है शाम वैसी और डेरा फिर वही रोशनी के बीच भी फैला अँधेरा फिर वही शोर ये शमशान में है चल रही है लाश, पर दफ़्न हूँ मैं कब्र में मेरा बसेरा फिर वही रात अँधियारी बहुत है सब्र कब तक हम करें दिल हुआ बेचैन क्या होगा सवेरा फिर वही धुन पुरानी ही बजेगी खेल होगा साँप का साँप है बाजू में उसके है सँपेरा फिर वही नाचतीं अटखेलियाँ करतीं हैं जब भी मछलियाँ जाल में उनको फँसाता तब मछेरा फिर वही हट गया है चीन अब इस बात का चर्चा बहुत पर दिखाया सैटलाइट ने है घेरा फिर वही धान, गेहूँ, साग-सब्ज़ी मुल्क़ में भरपूर है पर 'अमर' क्यों हाल अब भी तेरा मेरा फिर वही

मैं भी हो आया बुक फेयर (कविता)

मैं भी हो आया बुक-फेयर --------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा ) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 कई सालों बाद इस साल मैं भी हो आया बुक-फेयर मेट्रो से उतरकर मेट्रो स्टेशन में ही टिकट लेने का चला चक्कर टिकट लेकर काफी धूमकर भूल-भूलैया से रास्ते तेढ़ी-मेढ़ी उबड़-खाबड़ थी वह डगर कम से कम एक किलोमीटर पैदल चलकर पहुँच गया मैं बुक-फेयर लेकर घर आ गया बहुत सारी किताबें खरीदकर। मैं भी हो आया बुक फेयर। रास्ते में मूँगफली बेचने वाले पावभाजी सैंडविच पापड़ आलू के पराठे खिलाने वाले और न जाने क्या-क्या दिखाने वाले विक्षुब्ध विश्वामित्र द्वारा बनाई गई अजूबी दुनिया के अजूबे वासिंदे की तरह आज भी एक अलग दुनिया में त्रिशंकु बने हुए मजबूर होकर टंगे हुए कई लोगों का लगा हुआ था बुक फेयर के बाहर एक और फेयर मैं भी हो आया बुक फेयर। बाहर के इस फेयर में मिल रहीं थी किताबें भी मंहगी-मंहगी किताबें सस्ते में मिल रहीं थी बेचने वाले भी सस्ते लग रहे थे कपड़े मैले जो पहन रखे...