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अब सब सायाने हो गये .................................. अमर पंकज (डा अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय ऐसा नहीं कि लोग सुनते नहीं किसी को भी नही सुनते लोग गौर से देखा-सुना करिए आप भी कोयल, मोर, कौआ, मुर्गे मेढक, झींगुर, भौंरे, तितली सबको मौसम-बेमौसम रोज-रोज अब सुना करते लोग। शेरों की नकल करते सियारों की बनावटी दहाड सुन रोज हँसते हैं लोग तो क्या हुआ जो अब जंगल नहीं रहे शहर ही कंक्रीट के जंगल बन गये जंगली जानवर शहर आ गये फिर भी शेर और शियार के फर्क को पहचानते हैं लोग। ऐसा नहीं कि लोग मुझे नहीं सुनते मेरा बोलना तो क्या खांसना भी कान लगाकर सुनते हैं लोग बातें क्या हमेशा शक्ल देखकर कयास लगाते हैं लोग भंगिमाओं का मतलब अक्सर गुनते रहते हैं लोग। सबको बड़े ध्यान से सुनते हैं लोग केजरीवाल जी को सुनते हैं मोदी जी को भी सुनते हैं और आजकल तो योगी जी को सुनते रहते हैं लोग सब के सब जो सुनाते रहते हैं मंदिरों से, मसजिदों से जागरणों से, ज़लसों से भौंपू पर चीख कर कान पकाते रहते हैं उनको भी सुनते रहते हैं लोग। कल भी सुनते थे लोग आज भी सुनते हैं लोग युगों-युगों से इस धरा पर लोगों का काम ही रहा ह...
(ग़ज़ल) कहना ग़ज़ल अब मेरी आदत बन गई ------------------------------------------ कहना ग़ज़ल अब मेरी आदत बन गई ये ज़िंदगी में ज़ख्म निस्बत बन गई कुदरत ने जलवे कुछ दिखाए इस कदर कुदरत की हर शै ही इबादत बन गई लमहों में जीने का मज़ा अब आ रहा लमहों की खुशियाँ मेरी किस्मत बन गई पीते रहे ग़म, प्यास भी बढ़ती रही उल्फ़त, पिए बिन ही हकीकत बन गई कोई पिए तन्हा तो कोई बज्म में आँखों से मय पीने की, आदत बन गई मैंने पिए प्याले ग़मों के उम्र भर अब अश्क़ पीना मेरी फ़ितरत बन गई बेचैन तुम पीने की ख़्वाहिश में 'अमर' हाथों में साग़र हो ये चाहत बन गई ------ डॉ अमर पंकज
दोहे ------- जीवन हर्ष-विषाद है, रहता सबके साथ धीरज से तुम काम लो, विधि के लंबे हाथ। पचपन अब पूरे हुए, लेकिन हृदय जवान मिली शोहरत भी मुझे, किया कभी न गुमान। वर्ष सैंकड़ों जा चुके , छोड़ा मिथिला धाम पुण्य धरा शिव-शक्ति की, खैरबनी है ग्राम। ठिठुरन भी लाती हँसी, शिशिर दे रहा सीख भाग्य सिर्फ पुरुषार्थ है, हर्ष नहीं है भीख। कृष्ण पक्ष शनिवार था, सुखमय अगहन मास साल बीस सौ बीस का, दिन वो था इक खास। जब मैं पहुँचा मर्म तक, बहा नयन से नीर पीछे इस मुस्कान के, अकथनीय सी पीर। दुमका-सारठ-देवघर, से मेरी पहचान दिल्ली में सब दिन रहा, लेकिन मैथिल आन। बरस दुवादस देहली, बीस गाज़ियाबाद घाट-घाट के नीर का, चखा प्रेम से स्वाद। पापड़ बेले हैं बहुत, किया कभी न मलाल उबड़-खाबड़ रही डगर, किया कभी न सवाल। भाव शून्य मत हो 'अमर', देखो जीवन-रंग प्रीति करो मन में रखो, हर दिन नई उमंग। ✍  अमर पंकज  🌹 🌹 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷
दोहे ---- तुझमें-मुझमें सब फँसे, उसको अब बिसराय खुद में गर ढूँढें उसे, जग अपना हो जाय। उसके पीछे मैं चला, बिना किए कछु शोर जबसे मैं पीछे मुड़ा, वही दिखे हर ओर। हँस-हँस कर आगे बढ़ा, देखा यह संसार नदिया बहती आग की, उतरें क़ैसे पार। कहाँ नहीं खोजा उसे, भटका मैं हर रोज पत्थर मारा शीश पर, बाकी बची न खोज। तन-मन दोनों एक हो, सब दिन की थी चाह तन को लागी चोट तो, मन भरता है आह। दोहा अब कैसे कहें, रक्खें कैसे बात मन विचार करता रहा, बीत गई अब रात। मैं तो लेता ही रहा, नाम उसी का मीत रब से है बिनती यही, बनी रहे यह प्रीत। देखो मैंने क्या किया, जाने क्या संसार खुद को जों मैं जानता होता बेड़ा पार। पीर पराई क्या कहें, खुद में ही था मस्त पर जब डूबा इश्क में, मेरा निज भी अस्त। मैं क्या जानूँ इल्म को, बसता वो किस देश रहबर रूठा तो 'अमर', बढ़ा लिये हैं केश। --------- डॉ अमर पंकज 
दोहे --------------------------------------------------- माँ तुम दो वरदान यह, सुखमय हो संसार दुखी नहीं कोई रहे, बना रहे बस प्यार। जाति-धर्म के नाम पर, होवे नहीं बवाल प्रेम पूर्ण जीवन बने, ऐसा करो कमाल। हो विकास चहुँदिश यहाँ, पिछड़ापन हो दूर हरे-भरे जंगल रहें, खेती हो भरपूर। कृपा करें गुरुजन सभी, मिले नयी नित सीख कंचन सी काया रहे, माँ दे दो यह भीख। खल जो करे कुपथ गमन, उस पर अंकुश डाल जो अनुगामी धर्म का, होवे क्यों बेहाल। उसको पूछे कौन है, जो सद्गुण की खान अधम-नीच खुद को कहे, अवतारी भगवान। कितने रावण-कंस अब, नित लेते अवतार त्राहि-त्राहि सब कर रहे, सुन लो करुण पुकार। देवासुर संग्राम का, नहीं हुआ है अंत रक्तबीज से हैं खड़े, देखो दैत्य अनंत। नवयुग का आगाज़ हो, माँ दे दो आशीष पर पीड़क का नाश हो, चाहे काटो शीश। देखा बरसों से 'अमर', नौ दिन पूजें लोग दशमी को आनंद लें, तन-मन रहे निरोग। ✍  डाॅ अमर पंकज
दोहे ------------------- जब भी कुछ हो बोलना, बोलो अमृत घोल नित्य करो धर्माचरण, मत पीटो तुम ढोल। अद्भुत महिमा प्रेम की, जीवन का सच जान मन मयूर नर्तन करे, शीतल हो दिनमान। सुंदर जग में सब दिखे, जों सुंदर मन होय सबपर बरसे नेह तो, बैरी ना हो कोय। संगति उनकी कीजिए, जिनपर हो विश्वास पल पल बदले रंग जो, उनसे क्या है आस। मनमानी करता रहा, खुद को समझ महान भेद खुला जब आज तो, रोए साँझ-विहान। सिंहासन पर बैठता, चोरों का सरताज बेशर्मी से लूटता, किए बिना कछु काज। घड़ा पाप का भर चुका, देखो सब अब खेल अब वह बच सकता नहीं, कर ले रेलमपेल। दुर्जन ऐसे भौंकता, जैसे पागल श्वान साधु करे है साधना, रखता सबका ध्यान। पागल हाथी गाँव में, घुस तोड़े घर-बार बेड़ी पड़ती पाँव में, तो होता लाचार। मैला मन झूठी हँसी, खल की ये पहचान बोली लिपटी चासनी, 'अमर' बात ये जान। ------ डॉ अमर पंकज