संदेश

HAPPY VALENTINE DAY

बड़ी मारा-मारी मची हुई है. कहीं प्यार--सेक्स का इज़हार हो रहा है तो कहीं प्यार पर बंदिश लगायी जा रही है. इस बीच मीडिया और दुनिया के अमीर लोग इस दिन के कांसेप्ट को बेच कर और अमीर बन रहे हैं. तो फिर मैं क्यों इस दिन की बधाई आपको दे रहा हूँ? किस पाले मैं हूँ मैं? जाहिर है लोग ऐसा ही कुछ जानना चाहेंगे. तो मैं बता दूँ की हमारा नारी-खंड प्रदेश जो आज का संताल परगना है, अपने आस-पास के प्रदेशों में जबरन अपनी भूमि को खो देने वाला, जबरन किसी और के साथ बंधने को मजबूर संताल परगना, महाभारत कल से ही प्रेम की उत्कटता का प्रतीक रहा है. पुरुष ही नहीं नारी भी दैहिक आकर्षण को मुखर स्वर दे सकती हैं इसका उदहारण रहा है यह प्रदेश--नारिखंड का प्रदेश. महाभारत के पन्नों को पलटिये और देखिये की किस तरह कुंती की देहिक प्रेमाकांक्षा यहाँ प्रज्वलित हो उठी थी. आज भी यहाँ के वन-प्रांतर में प्रेम या की --देह से आत्मा तक की यात्रा-- के कई सहज दृष्य हमको मिल जाते हैं. चाहे देह से आत्मा तक की यात्रा हो या मन से तन तक की तृप्ति--यहाँ की मिटटी सब कुछ देने में सक्षम है. तो फिर बवाल कहे का.और फिर चाहे -अनचाहे हम सब दुनिया की...

YAH NAYA AVTAR TO HAI HI, APANI PRACHIN ASMITA KI PAHCHAN HAI

अरे भाई चोंकिये नहीं, न ही वितृष्णा से मुह बिचकायिए. पंकज-गोष्ठी ब्लॉग विशुद्ध एतिहासिक एवं साहित्यिक संस्था को जीवित रखने का उपक्रम है, इसीलिए htt नमक  नवीन ब्लॉग की शुरुआत की है मेने, कृपया उसे जरूर विसित करें और मेरा मनोबल बढ़ाएं. हाँ इस ब्लॉग के नवीन अवतार के पीछे की तड़प को भी अगर आप पहचान पायें तो मेरा सपना सार्थक होगा. ज्यों-ज्यों में संताल परगना पर अपना शोध बाधा रहा हूँ, त्यों-त्यों मेरा विशष बढ़ता जा रहा है कि इस भूमि कि भयंकर उपेक्षा हुई है. ये तो महान सिदु-कान्हो-चाँद-भैरव का पुरुषार्थ था कि इस भूखंड को हल में, यही १५५ बरस पहले एक पहचान मिली है, वह भी विखंडित पहचान. मंदार  पर्वतराज, जो इस पवित्र भूमि का मुकुट रहा है, आज भी इससे अलग है. बाबा बैद्यनाथ इसके ह्रदय स्थल में ,  शक्ति के ह्रदय-स्थल में  भी, विद्यमान हैं यहाँ. पर शक्ति देवी माँ तारा के रूप में, जो इस भूमि कि शक्ति  रही हैं, वह आज भी बाहर रहने को विवश हैं. पूरा अरण्य-प्रदेश जो इस प्राचीन नारी-खंड कि पहचान है, आज भी इससे बाहर है, बांका के जंगल के रूप में. जमुई के  नरेश, ...

भाव भीनी श्रधांजलि देकर पंकज जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की.

१७-२१ जनवरी तक आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा 'पंकज' के पैत्रिक ग्राम--खैरबनी, पोस्ट--सारठ, जिला--देवघर, झारखण्ड में पंकज जी की स्मृति में पंच- दिवसीय चंडी-परायण यज्ञ का आयोजन हुआ. इस यज्ञ के मुख्य अतिथि थे झारखण्ड के कृषि-मंत्री श्री सत्यानन्द झा एवं प्रोफेसर सत्यधन मिश्र इस कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि थे. पंकज जी के तीसरे सुपुत्र एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय में असोसिएट प्रोफेसर अमर नाथ था के सान्निध्य में कार्यक्रम का आयोजन हुआ. कार्यं का सञ्चालन पंकज जी के दूसरे सुपुत्र और राजभासा विभाग, भारत सरकार में उप-निदेशक डॉक्टर विश्वनाथ झा ने किया और पंकज जी के बड़े सुपुत्र डॉक्टर नन्द किशोर झा, जो यज्ञ समिति के अध्यक्ष भी थे, ने कार्यक्रम क़ि अध्यखता की. कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मंत्री श्री सत्यानन्द झा ने भरी सभा में गौरव के साथ इस बात को रखा की आज वह जो कुछ भी हैं वह पंकज जी की कृपा से ही हैं. पंकज जी ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा था. निराशा के दिनों में वह यस सोचकर हिम्मत रखते थे की पंकज जी जैसे महान पुरुष का शिष्य होकर उन्हें कभी हिम्मत नहीं हराना...

Migration of Maithil Brahmins in the region of Santal Pragnas and its surroundings

Anusandhanika / Vol. VIlI / No. II / July 2010 / pp. 184-189 ISSN 0974 - 200X -184- Migration of Maithil Brahmanas to Santal Parganas Amar Nath Jha Associate professor in History S. S. N. College University of Delhi, Delhi Abstract As far as the migration of Maithil Brahmanas in the area of our concern, Santal Parganas, is concerned we do not have any source to establish as when did they come to this area. During Pala period a large number of Brahmanas migrated to Bengal where, they received gifts of land and were offered high posts in the administration of the state. Similarly, the migration of Brahmanas also took place from Mithila in different directions. As far as the migration of the Maithil Brahman Panditas is concerned, we find that they migrated to Bengal in good numbers. The story of Adisura, a legendry king of Bengal is being credited for the migration of Maithil Panditas to Bengal. we can conclude that both D. C. Sircar and R. C. Majumdar are w...

वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हावी है.

आज कल देश में कई तरह की प्रवृतियाँ और विकृतियाँ एक साथ सक्रिय हैं. साहित्य, खेलकूद, संसद, सरकार, शिक्षा और धर्म--प्रत्येक मोर्चे पर कानफाडू चीख-पुकार मची हुयी है. सभी कोई देश सवारने में लगे होने का दावा कर रहे हैं, पर समाज बिखरता जा रहा है. क्यों? धर्म,जाति, के ठेकेदार जोर-जोर से अपनी बात कहकर खुद के जीतने का अहसास करा  रहे हैं, राजनीति के चतुर खिलाडी हमारी संवेदनाओं को कुचलते हुए देश को विकास के पथ पर ले जाने का आलाप कर रहे हैं, शिक्षक पूरे देश को क्रांति का पाठ पढ़ाने में लगे हुए हैं जबकि कॉलेज वीरान हो रहे हैं. साहित्यकारों की क्या बात करें? अपने-अपने मठों के महंत दूसरों  की बोटी-बोटी नोच लेने पर तुले हुए हैं. हम जो लिखें साहित्य; तुम लिखो तो कूड़ा--ये हिंदी जगत की शाश्वत घटिया राजनीति है और लेखक होने के कारण हम जन्मना महान हैं. क्या कहें, क्या न कहें? वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हावी है. क्या करें हम? क्या करो  तुम? क्या करें हम सब? कैसे करें हम सब?

वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हाबी है. .....see ...

आज कल देश में कई तरह की प्रवृतियाँ और विकृतियाँ एक साथ सक्रिय हैं. साहित्य, खेलकूद, संसद, सरकार, शिक्षा और धर्म--प्रत्येक मोर्चे पर कानफाडू चीख-पुकार मची हुयी है. सभी कोई देश सवारने में लगे होने का दावा कर रहे हैं, पर समाज बिखरता जा रहा है. क्यों? धर्म,जाति, के ठेकेदार जोर-जोर से अपनी बात कहकर जीतने का अहसास कर रहे हैं, राजनीति के चतुर खिलाडी हमारी संवेदनाओं को कुचलते हुए देश को विकास के पाठ पर ले जाने का आलाप कर रहे हैं, शिक्षक पूरे देश को क्रांति का पाठ पढ़ाने में लगे हुए हैं जबकि कॉलेज वीरान हो रहे हैं. साहित्यकारों की क्या बात करें? अपने अपने मठों के महंत दोसरों की बोटी बोटी नोच लेने पर तुले हुए हैं. हम जो लिखें साहित्य तुम लिखो तो कूड़ा--ये हिंदी जगत की शाश्वत घटिया राजनीति है और लेखक होने के कारण हम जन्मना महान हैं. क्या कहें, क्या न कहें? वितृष्णा की हद तक विकृति की प्रवृति हाबी है. क्या करें हम? क्या काटो तुम? क्या करें हम सब? कैसे करें हम सब?

आचार्य पंकज के विराट व्यक्तित्व की प्रतिध्वनि: उद्‍गार - अमरनाथ झा

आचार्य पंकज के विराट व्यक्तित्व की प्रतिध्वनि: उद्‍गार आज 30 जून है. आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ का जन्मदिवस. अगर आज वे होते तो 91 साल के हो चुके होते. परंतु दीर्घायु होना उनके भाग्य में नहीं था. बल्कि समस्त हिंदी संसार का यह दुर्भाग्य था कि पंकज जी जैसे उद्‍भट्ट विद्वान और महत्वपूर्ण कवि मात्र 58 वर्ष की उम्र में अलविदा हो गये. इससे भी अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि अपने अनेकों कार्यों से इतिहास बनाने वाले इस चामत्कारिक व्यक्तित्त्व की साहित्यिक सेवाओं का हिंदी समाज में समुचित मूल्यांकन अभी तक नहीं किया है. पिछले बरस आज ही के दिन उनकी 90 वीं जयन्ति पर समस्त अंग प्रदेश के कृतज्ञ कवियों, लेखको और बुद्धिजीवियों ने उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके ऐतिहासिक अवदानों का पुण्य स्मरण किया था. पिछले बरस ही उनकी 32 वीं पुण्य तिथि पर यहां दिल्ली में भी जहां एक ओर डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने उनकी पचास बरस पुरानी हिमालय शीर्षक कविता को आज तक हिमालय पर लिखी गयी हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कविता घोषित की थी, वहीं मस्तराम कपूर ने उनकी उद्बोधन शीर्षक कविता को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि बताते ...